हिंदू धर्म पद्धति में ध्यान यानि मेडिटेशन को सबसे ज्यादा प्रभावी और महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ध्यान की अनन्त गहराइयों में उतरने के बाद आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है। यह भक्त की भगवान से संवाद स्थापित करने की राह मानी जाती है। धर्मशास्त्रों में कितने ही मनुष्यों, देवताओं और असुरों तक का वर्णन मिलता है, जिन्होंने वर्षों तपस्या कर, ध्यान लगाकर परमात्मा के साक्षात दर्शन किए और मनचाहे वरदान पाए। अर्थात् ध्यान एक ऐसी शक्ति है, जो भगवान को भी प्रकट होने पर विवश कर देती है। ध्यान लगाना, मन को एकाग्र करना थोड़ा कठिन कार्य माना जाता है क्योंकि मनुष्य का मन बहुत चंचल होता है। ध्यान में बैठने के बाद भी वह कई स्तरों पर कहीं ना कहीं भटकता रहता है। इस मन को साधने के लिए हिंदू धर्म पद्धति में ध्यान के साथ माला जपने का नियम बनाया गया है। ध्यान लगाने के लिए कई तरह की मालाएं उपलब्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि माला के मनके गिनने के साथ जाप को समाहित कर देने से उतनी देर के लिए मन बंध जाता है और भटकने नहीं पाता। ध्यान लगाने के लिए उपलब्ध माला में एक बात समान होती है, उनके मनकों/दानों की संख्या। यानि ध्यान लगाने के लिए माला आप कोई भी लें, उसमें मनके या दाने या मोती 108 ही होते हैं।

माला के संबंध में एक बात ध्यान देने योग्य है कि आप जिस ईष्ट देव का ध्यान करने जा रहे हैं, उसी के अनुरूप माला का चयन किया जाना चाहिए। जाप करने के लिए बाजार में रूद्राक्ष, तुलसी, वैजयंती, स्फटिक, मोतियों या विभिन्न मणियों से बनी मालाएं उपलब्ध हैं। इनमें से हर माला का अलग प्रभाव है और हर देव की सिद्धि के लिए अलग माला निर्दिष्ट है। इन मालाओं में विशेष प्रकार की चुंबकीय और विद्युतीय तरंगे होती हैं, जो जाप करने के साथ साधक के शरीर और आसपास के वातावरण में विस्तारित होती हैं। इसलिए पूरी जानकारी के बाद ही जाप की माला का चुनाव किया जाना चाहिए। यदि आप बिना किसी विशेष उद्देश्य के केवल मन की शांति के लिए ध्यान लगाना चाहते हैं तो इसके लिए रूद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ है। रूद्राक्ष की माला को फेरने से वातावरण में चुंबकीय और विद्युतीय के साथ कीटाणुनाशक तरंगें भी निकलती हैं। यह साधक के साथ-साथ उसके आसपास के वातावरण को भी स्वस्थ और बीमारियों से रहित बनाती हैं।

उपासना में माला का महत्त्व :

ईश्वर की आराधना में मंत्रों के जाप का विशेष महत्त्व है। इसके साथ ही देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए माला के साथ मंत्र जाप करने का विधान है। मंत्रों के जाप के लिए लोग अक्सर एक ही माला का प्रयोग करते हैं। वहीं ज्योतिष के जानकारों की मानें तो हर देवी-देवता की आराधना के लिए एक विशेष माला तय है, जिसके प्रयोग से देवी-देवता जल्दी प्रसन्न होते हैं। उचित माला से मंत्रों का जाप करने से मंत्र शीघ्र सिद्ध होते हैं। चलिए आपको बताते हैं कि कौन-से देव का मंत्र जाप कौन-सी माला से करना सही होता है।

रुद्राक्ष की माला का महत्त्व :

सामान्यतः रुद्राक्ष की माला से किसी भी मंत्र का जाप कर सकते हैं।
शिव जी और उनके परिवार के लिए मन्त्र जाप रुद्राक्ष की माला से लाभकारी होता है
महामृत्युंजय और लघुमृत्युंजय मन्त्र केवल रुद्राक्ष पर ही जपना चाहिए।

स्फटिक की माला का महत्त्व :

माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी के मन्त्र इस माला से जपना उत्तम होता है।
यह माला एकाग्रता, सम्पन्नता और शान्ति की माला मानी जाती है।
धन प्राप्ति और एकाग्रता के लिए स्फटिक की माला धारण करें।

हल्दी की माला का महत्त्व :

विशेष प्रयोगों और मनोकामनाओं के लिए हल्दी की माला का प्रयोग किया जाता है।
बृहस्पति देव और माँ बगलामुखी के मन्त्रों के लिए हल्दी की माला का प्रयोग होता है।
हल्दी की माला से ज्ञान और संतान प्राप्ति के मन्त्रों का जाप भी कर सकते हैं।

चन्दन की माला का महत्त्व :

चन्दन की माला दो प्रकार की होती है – लाल चन्दन और श्वेत चन्दन।
देवी के मन्त्रों का जाप लाल चन्दन की माला से करना फलदायी होता है।
भगवान कृष्ण के मन्त्रों के लिए सफेद चन्दन की माला का प्रयोग कर सकते हैं।

तुलसी की माला का महत्त्व :

वैष्णव परंपरा में इस माला का अत्याधिक महत्त्व है।
भगवान विष्णु और उनके अवतारों के मन्त्रों का जाप इसी माला से किया जाता है।
यह माला धारण करने पर वैष्णव परंपरा का पालन जरूर करना चाहिए।
तुलसी की माला पर कभी भी देवी और शिव जी के मन्त्रों का जप नहीं करना चाहिए।

माला में 108 दाने क्यों होते हैं ?

प्रार्थना करने के कई तरीके हैं, शब्द, कीर्तन या मंत्र से प्रार्थना। इनमें मंत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली माने जाते हैं जो मन को तुरंत एकाग्र करते हैं। माला के साथ मंत्र जाप करने से मन्त्रों की शक्ति का पूरा लाभ मिलता है। मंत्र जाप में संख्या का विशेष महत्त्व है। निर्धारित संख्या में मंत्रों का जाप करने के लिए भी माला का प्रयोग होता है। इससे मंत्रों की संख्या गिनने में आसानी होती है। माला में लगे हुए दानों को मनका कहते हैं। आमतौर पर माला में 108 मनके होते हैं। कभी-कभी माला में 27 या 54 मनके भी होते हैं, जो 108 के ही गुणज हैं।
ऋषि-मुनियों ने धार्मिक कार्यों में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु को अनन्त वैज्ञानिक शोधों के बाद निर्दिष्ट किया है। पूजा की हर वस्तु, उससे निकलने वाली तरंगों और प्रकृति पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के अनुरूप मान्य की गई हैं। जाप की माला के लिए भी प्रकृति के विभिन्न ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों की गणना करके ही मनकों की संख्या निर्धारित की गई है। माला के 108 मनकों की संख्या का आधार यह गणना है।

ब्रह्माण्ड में नवग्रहों को ज्योतिषीय गणना में लिया गया है अर्थात् ब्रह्माण्ड में ग्रहों की संख्या 9 मानी गई है। समस्त व्यक्तियों के भाग्यफल के अध्ययन के लिए कुल 12 राशियां निर्धारित की गई हैं। अब 9 ग्रहों और 12 राशियों को गुणा यानि मल्टीप्लाय किया जाए तो जो संख्या सामने आती है, वह है 108।

इसी प्रकार, भारतीय पंचांग 27 नक्षत्रों की भी गणना करता है। हर नक्षत्र के 4 चरण माने गए हैं। अब 27 को भी 4 से गुणित या मल्टीप्लाय करें तो संख्या 108 ही आती है। इसका सूक्ष्म अर्थ यह है कि जब कोई साधक माला फेर रहा होता है, तो वह अपने हर स्पर्श से ब्रह्माण्ड के 9 ग्रहों, 12 राशियों और 27 नक्षत्रों को जागृत कर रहा होता है। यही कारण है कि नियमित रूप से, पवित्र मन से, पूरे ध्यान से माला फेरने से चमत्कारिक प्रभाव सामने आते हैं। इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि –

षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।
एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।

इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सांसों की संख्या के आधार पर 108 दानों की माला स्वीकृत की गई है। एक व्यक्ति 24 घंटों में 21600 बार सांस लेता है। चूंकि 12 घंटे दिनचर्या में निकल जाते हैं, तो शेष 12 घंटे देव-आराधना के लिए बचते हैं। अर्थात् 10800 सांसों का उपयोग अपने ईष्टदेव को स्मरण करने में व्यतीत करना चाहिए। लेकिन इतना समय देना किसी सांसारिक व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता, इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।

संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और यह चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों की ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इसी तरह सूर्य की 9 रश्मियां जब पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई, वह संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्माण्ड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की वर्णमाला आधारित हैं। इन ध्वनियों का उच्चारण माला के रूप में किया जाता है।

अन्य मान्यता के अनुसार, माला के 108 मोती और सूर्य की कलाओं का संबंध है। एक वर्ष में सूर्य लगभग 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। इस तरह सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटा कर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का हर एक मोती सूर्य की हर एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले भगवान हैं। भगवान सूर्य मनुष्य को तेजस्वी बनाते हैं और समाज में मान-सम्मान दिलाते हैं।

माला के प्रयोग की सावधानियां :

माला के मनकों की संख्या कम से कम 27 या 108 होनी चाहिए।
हर मनके के बाद एक गाँठ जरूर लगी होनी चाहिए।
मंत्र जाप के समय तर्जनी अंगुली से माला का स्पर्श नहीं होना चाहिए
सुमेरु (माला के सूत्र की गांठ) का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। सुमेरु से माला घुमाकर जाप करना चाहिए।
मंत्र जाप के समय माला किसी वस्त्र से ढंकी होनी होनी चाहिए।
मंत्र जाप करने के पूर्व हाथ में माला लेकर संबंधित देवता से मंगल प्रार्थना करनी चाहिए।
जाप करते समय ईष्ट देव से प्रार्थना करें कि माला से किया गया मंत्र जाप सफल हो।
आध्यात्मिक विकास और मानसिक शांति के लिए प्रतिदिन 5 माला जाप अवश्य करना चाहिए –
1. गणेश मंत्र से, 2. गायत्री मंत्र से, 3. महामृत्युंजय मंत्र से, 4. वार के ग्रह और 5. ईष्ट देव के लिए।
अपनी माला दूसरों को नहीं देनी चाहिए तथा कभी भी दूसरे की माला का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
जिस माला से मंत्र जाप करते हैं उसे गले में धारण नहीं करना चाहिए।