ओ३म् ( ॐ ) का महत्त्व
ओ३म (ॐ) शब्द तीन अक्षर ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ से मिलकर बना है जो ईश्वर का वाचक शब्द है। यह त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भूः (भूलोक), भुव (पाताल) स्वः (स्वर्ग लोक) का प्रतीक है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ओंकाररूपी ध्वनि का ही उच्चारण होता है। सृष्टि की उत्पत्ति में ॐ की बड़ी महिमा है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सदा ॐ की ध्वनि निस्सृत होती रहती है। हमारी हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है जो श्वास की गति को नियंत्रित करती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को ‘एकाक्षर ब्रह्म’ कहा गया है। इस एक शब्द को ब्रह्माण्ड का सार माना जाता है। अक्षर की दृष्टि से ओंकार (ध्वनि) है और मात्रा की दृष्टि से अ, उ और म रूप है। ‘अ’ ब्रह्मा का वाचक है, उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। ‘उ’ विष्णु का वाचक है, उसका त्याग कंठ में होता है तथा ‘म’ रुद्र का वाचक है और उसका त्याग तालुमध्य में होता है। प्रकारांतर से यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण अवस्थाओं के भी वाचक हैं।
ब्रह्माण्ड का पूरा सत्य ‘ॐ’ के अंदर ही स्थित है। अ से आकार, उ से उपकार, म से मरना और बिंदु को हमें परमपिता परमात्मा का रूप समझना चाहिए। जब जीव जन्म लेता है तो उसे एक आकार मिलता है। उसे अपना जीवन दूसरों के उपकार के लिए लगाना चाहिए। अंत समय में सभी प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इन सभी का साक्षी परमपिता परमात्मा एक बिंदु रूप में जीवनभर हमारे साथ रहते हैं। इसलिए हमें अपना जीवन सदा ही धर्म कार्यों के लिए लगाना चाहिए। ॐ को अत्यन्त पवित्र और शक्तिशाली माना गया है। ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जपकर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।
ॐ उच्चारण की विधि :
प्रातः उठकर शौच से निवृत्त होकर, स्नान से पवित्र होकर, खाली पेट ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर 11, 21, 51, 108, 1008 कितनी ही बार समय व सामथ्र्य अनुसार कर सकते हैं। आसन पर बैठकर इसका जप करने से मन को शांति तथा एकाग्रता की प्राप्ति होती है। ॐ का जाप करते समय माला भी गिन सकते है। ॐ का उच्चारण जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे भी बोल सकते हैं। किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है, जैसे, श्रीराम का मंत्र ॐ रामाय नमः, विष्णु का मंत्र ॐ विष्णवे नमः, शिव का मंत्र ॐ नमः शिवाय, प्रसिद्ध हैं। गीता में ॐ के महत्त्व का कई बार वर्णन किया गया है। गीता के आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परमगति प्राप्त करता है।
इस मन्त्र के उच्चारण से आपके आसपास धनात्मक उर्जा का निर्माण होता है, नकारात्मक उर्जा, बीमारी, दुःख, चिंता नष्ट हो कर आपका जीवन स्वर्ग बन जाता है। जब कभी भी आप कोई काम न कर रहे हों या यात्रा कर रहे हो या मन परेशान हो, तब चित्त को शांत करने की कोशिश करते हुए इस अलौकिक पवित्र अक्षर ॐ का मन में उचारण करते रहें और चमत्कार देखें।
ॐ के जाप से आत्मिक लाभ :
ॐ केवल एक पवित्र ध्वनि ही नहीं, अपितु अनंत शक्ति का प्रतीक है।
ॐ ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और सम्पूर्ण सृष्टि का द्योतक है।
ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है।
ॐ का जाप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति की है।
ॐ का निरन्तर उच्चारण करते रहने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।
ॐ का जाप शुद्ध आसन पर बैठकर करने से वर्तमान और भविष्य दोनों जीवन लक्ष्य की और अग्रसर होते हैं।
ॐ के उच्चारण से शारीरिक लाभ :
※ यदि घबराहट या बेचैनी महसूस होती है तो ॐ का उच्चारण करें। नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है,
※ यह शरीर के विषैले तत्त्वों अर्थात् तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
※ यह हृदय और रक्त के प्रवाह को संतुलित रखता है। कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है।
※ इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।
※ ॐ के पहले शब्द का उच्चारण करने से मस्तिष्क में कंपन पैदा होती है, इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।
※ ॐ के दूसरे शब्द का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो कि थायरायड ग्रंथी पर प्रभाव डालता है।
※ रात को सोते समय नींद आने तक मन में ॐ का जप करने से निश्चित नींद आएगी।