गायत्री मंत्र का महत्त्व
गायत्री माता कौन है ?
पद्मपुराण के अनुसार वज्रनाश नामक राक्षस का वध करके ब्रह्माजी ने मानव कल्याण के लिए पुष्कर में एक यज्ञ करने का निर्णय किया। ब्रह्माजी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुंच गए, लेकिन किसी कारणवश उनकी पत्नी सावित्री समय पर नहीं पहुंच सकीं। मान्यता है कि यदि धार्मिक कार्यों में पत्नी साथ हो तो उसका फल अवश्य मिलता है। इस कारण उन्होंनें यज्ञ में शामिल होने के लिए वहां उपस्थित नंदिनी गाय के मुख से एक अन्य स्त्री ‘गायत्री’ को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया।
-ः गायत्री मन्त्र:-
ओ३म् भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्।।
-ः मंत्र का अर्थ:-
| ओ३म् = सर्वरक्षक परमात्मा भुवः = दुख विनाशक तत् = उस वरेण्यं = वरण करने योग्य देवस्य = देव का धियो = बुद्धियों को नः = हमारी | भूः = प्राणों से प्यारा स्वः = सुख स्वरूप सवितुः = प्रकाश उत्पादक भर्गो = शुद्ध स्वरूप धीमहि = हम ध्यान करें। यः = वह प्रचोदयात् = शुभ कार्यों में प्रेरित करें। |
व्याख्या : उस प्राणों से प्यारे, दुख विनाशक, सुख स्वरूप, प्रकाश उत्पादक जीवन में वरण करने योग्य शुद्ध स्वरूप देव (ॐ) का हम ध्यान करें, जिससे कि वह (परमात्मा) हमारी बुद्धि को शुभ कार्यों में प्रेरित करे।
भावार्थ : हमें, ओ३म् (ॐ) के तीन रूपों (ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव) द्वारा रचित त्रिगुणी (सत्, रज, तम) प्रकृति को धारण करने वाले समस्त (आकाश, पाताल एवं धरतीवासी) देवी/देवताओं का भिन्न-भिन्न प्रकार से ध्यान करते रहना चाहिए, ताकि हम मन, वचन और कर्म से जन कल्याण के कार्यों में लगे रहें।
गायत्री माता का स्वरुप
शास्त्रों में देवी गायत्री को वेदमाता (वेदों की ज्ञाता), देवमाता (ब्रह्मा की पत्नी) और विश्व को वेद ज्ञान देने के कारण विश्वमाता बताया गया है। माँ गायत्री का स्वरूप पंचमुखी बताया गया है जिसका अर्थ है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश आदि पांच तत्त्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी है, उन सबका शरीर भी इन्हीं पांच तत्त्वों से मिलकर बना है।

कमल पर विराजमान माँ गायत्री के दस हाथ बताए हैं, जिनमें वह कमलयुग्म, वरद मुद्रा, अभय मुद्रा, अंकुश, उज्ज्वल पात्र, शंख, चक्र, गदा, फरसा, रुद्राक्ष की माला आदि धारण किए हुए है। इनका अर्थ धर्म के दस लक्षणों से लिया जा सकता है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को माँ गायत्री की जयन्ती मनाई जाती है।
माता गायत्री का मन्दिर
माता गायत्री का सबसे प्राचीन मन्दिर पुष्कर में है। इन्हें ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। गायत्री मंत्र तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सार है। गायत्री मंत्र ब्रह्माण्ड के सभी मंत्रों का राजा है। इसके जपने से सभी मंत्रों का फल मिल जाता है। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ में उल्लेख है कि भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण सहित सभी देवता नित्य गायत्री महामंत्र की उपासना किया करते थे। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है, ‘गायत्री छन्दसामहं’ अर्थात् गायत्री मंत्र मैं स्वयं ही हूँ।

मन्दबुद्धि लोगों के लिए गायत्री मंत्र का महत्त्व अधिक हितकर सिद्ध होता है। कल्पना शक्ति की कमी, समय पर उचित निर्णय न कर सकना, विस्मृति, प्रमाद, अरुचि जैसे कारणों से भी मनुष्य मानसिक दृष्टि से अपंग और असमर्थ रहता है तथा मूर्ख कहलाता है। इस अभाव को दूर करने के लिए गायत्री मंत्र साधना एक उपयोगी एवं आध्यात्मिक उपचार है। अतः भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले प्रत्येक मनुष्य को भी नित्य-प्रतिदिन गायत्री माता के महामंत्र ‘गायत्री मंत्र’ की उपासना अवश्य करनी चाहिए।
गायत्री मंत्र की रचना
गायत्री मंत्र की रचना महर्षि विश्वामित्र द्वारा की गई है। जीवन के आरम्भिक वर्षों में महर्षि विश्वामित्र राजा गाधि के पुत्र कौशिक (विश्वरथ) नामक राजा थे। चक्रवर्तित्व की कामना से विश्व विजय कर रहे यह नरेश ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के ब्रह्मतेज से पराभूत हो गये। अतः ब्रह्मतेज अर्जित करने के लिए तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या भंग करने के लिए देवताओं ने मेनका नामक अप्सरा को भेजा। विश्वामित्र उस पर आसक्त हो गये। उससे शकुन्तला नामक एक कन्या उत्पन्न हुई। विश्वामित्र ने विचार किया कि लाख प्रयत्न करके भी मैं तपस्या में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। माया कब प्रवेश करती है मुझे पता ही नहीं चलता। लगता है कि मैं अपने बल से इन बाधाओं पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। आकाशवाणी द्वारा उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ और विश्वामित्र ने परमपिता ब्रह्मा की शरण ली। इस प्रकार अपने मन को भगवान के प्रति समर्पित कर विश्वामित्र तपस्या में लग गये। ब्रह्मा ने उन्हें गायत्री का महत्त्व बताया। तपस्या से ज्ञात होने पर विश्वामित्र ने ही गायत्री का आह्वान किया और सर्वप्रथम इस मंत्र का जाप किया। विश्वामित्र की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने आशीर्वाद दिया कि आज से आप महर्षि हुए।
विश्वामित्र द्वारा स्वर्ग स्थापना
एक बार त्रिशंकु नरेश ने उनसे सशरीर स्वर्ग जाने का अनुरोध किया। महर्षि ने अपने तपोबल से उसे स्वर्ग भेज भी दिया, परन्तु देवताओं को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने त्रिशंकु की प्रशंसा कर जानना चाहा कि किस पुण्यकर्म से वह सदेह स्वर्ग आया। त्रिशंकु ने अपने पुण्यकर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जिससे उसका पुण्य क्षीण होने लगा और वह स्वर्ग से नीचे गिरने लगा। उसने विश्वामित्र को अपनी दुर्दशा से अवगत कराया। ऋषि ने उसे बीच रास्ते में ही रोक दिया और उसके लिए अलग स्वर्ग की संरचना में लग गये। देवताओं के अनुरोध पर विश्वामित्र नवीन स्वर्ग रचना से विरत तो हो गये, किन्तु इससे उनकी तपस्या को गहरी क्षति पहुँची।
गायत्री मंत्र जप का समय
गायत्री मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। गायत्री मंत्र जप का पहला समय है सुबह का। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्योदय के बाद तक मंत्र जप करना चाहिए। दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। तीसरा समय है संध्याकाल। सूर्यास्त से कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। जप के समय को संध्याकाल भी कहा जाता है। यदि संध्याकाल के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।
गायत्री मंत्र जप की विधि
इस मंत्र के जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है। जप से पहले स्नान आदि कर्मों से खुद को पवित्र कर लेना चाहिए। मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 अर्थात् एक माला अवश्य होनी चाहिए। घर के मन्दिर में या किसी पवित्र स्थान पर गायत्री माता का ध्यान करते हुए मंत्र का जप करना चाहिए।
गायत्री मंत्र जप के लाभ
※ शुभ/अशुभ घटनाओं का पूर्वाभास होने लगता है।
※ आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है।
※ उत्साह एवं सकारात्मकता बढ़ती है।
※ क्रोध शांत होता है।
※ स्मरण शक्ति बढ़ती है।
※ बुराइयों से मन दूर होता है।
※ धर्म और सेवा कार्यों में मन लगता है।