मनुष्य जीवन में समय सबसे अधिक मूल्यवान हैं। एक कहावत है कि बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य, खर्च किया गया धन तथा रूठा हुआ मित्र तो वापिस मिल सकता है, मगर जो समय निकल चुका है, वह कभी लौटकर वापिस नहीं आता। इसीलिए समय का महत्त्व समझाते हुए सन्त कबीरदास जी ने लिखा हैं - 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

प्राकृतिक घटनाओं की अवधि और उनकी पुनरावृत्ति होने के अंतराल में आपसी भेद करने के लिए समय के मापन की शुरुआत हुई होगी। आदि काल में मनुष्य ने सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर प्रातः, दोपहर, संध्या एवं रात्रि की कल्पना की। रात्रि को समय का ज्ञान नक्षत्रों से किया जाता था।

घड़ी, पल या फिर क्षण जैसे शब्द भारत में हजारों वर्षों से कालगणना के मानक रहे हैं। एक दिन में आठ प्रहर होते हैं। आधुनिक मान से एक प्रहर तीन घंटे का होता है। एक पहर में 8 घड़ीयां होती हैं, एक घड़ी लगभग 24 मिनट के बराबर होती है। एक घड़ी में साठ पल होते हैं। एक पल में चैबीस क्षण होते हैं। एक क्षण लगभग 1 सेकंड का होता है। समय की सूचना देने के लिए सभी प्रमुख शहरों में घड़ियालियों की नियुक्ति की जाती थी। यह घड़ियाली वो शख्स होते थे, जो पीतल की दो हाथ जितनी चैड़ी परातनुमा मोटी प्लेट पर लकड़ी के हथोड़े से प्रहार करके लोगों को समय की सूचना देते थे। पीतल की यह खास प्लेट किसी ऊंची जगह पर लटकायी जाती थी। एक समय घड़ी की गणना किसी खास बरतन में पानी भरने की प्रक्रिया के द्वारा भी की जाती थी।

भारतीय कालगणना अचूक एवं अत्यंत सूक्ष्म है। जिसमें त्रुटी से लेकर प्रलय तक कि गणना की जा सकती है। ऐसी सूक्ष्म कालगणना विश्व की किसी और सभ्यता या संस्कृति में नहीं मिलती। भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक ‘सूर्य सिद्धान्त’ के अनुसार समय के दो रूप बताये गए हैं -
अमूर्त काल - ऐसा सूक्ष्म समय जिसको ना तो देखा जा सकता है और ना सामान्य इन्द्रियों से उनको अनुभव ही किया जा सकता है। जैसे ग्रह, नक्षत्रों की गति।
मूर्त काल - ऐसा समय जिसकी गणना संभव है एवं उसको, सामान्य इन्द्रियों से देखा और अनुभव भी किया जा सकता है। जैसे श्वास की गति।

आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि प्राचीन और आधुनिक कालगणना का मुख्य आधार भारतीय ज्ञान था। पुराणों में दिन, पक्ष, मास, अयन, युग और कल्प के बारे में विस्तार से लिखा है। वैदिक काल में ग्रह-नक्षत्रों और तारों के भ्रमणचक्र को आधार मानकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का समय निकाला गया था। जिस प्रकार पृथ्वी द्वारा अपनी धूरी पर घूमने और सूर्य की परिक्रमा से दिन-रात बनते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ग्रह-नक्षत्रों के दिन-रात भी अलग-अलग समय के होते हैं। जब इनका एक चक्र पूरा हो जाता है तो उसे एक लंबी काल अवधि पूर्ण मान लिया जाता है। अतः उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर समय का विभाजन निम्न प्रकार किया जा सकता है -

1 परमाणु - 1 गति - पलक के ऊपर जाने या नीचे आने का समय
1 अणु - 2 परमाणु - 2 गति - 0.0083 सेकंड
1 त्रुटि - 2 अणु - 4 परमाणु - 0.016 सेकंड
1 त्रिसरेणु - 3 त्रुटि - 6 अणु - 0.05 सेकंड
1 रेणु - 2.5 त्रिसरेणु - 7.5 त्रुटि - 0.125 सेकंड
1 लव - 4 रेणु - 10 त्रिसरेणु - 0.5 सेकंड
1 क्षण - 2 लव - 8 रेणु - 1 सेकंड
1 श्वास - 4 क्षण - 8 लव - 4 सेकंड
1 प्राण - 3 श्वास - 12 क्षण - 12 सेकंड
1 पल - 2 प्राण - 6 श्वास - 24 सेकंड
1 विपल - 2.5 पल - 5 प्राण - 60 सेकंड (1 मिनट)
1 निमेष - 3 विपल - 7.5 पल - 3 मिनट (180 सेकंड)
1 लघु - 4 निमेष - 12 विपल - 12 मिनट (720 सेकंड)
1 घड़ी - 2 लघु - 8 निमेष - 24 मिनट (1440 सेकंड)
1 मुहूर्त’ - 2 घड़ी - 4 लघु - 48 मिनट (2880 सेकंड)
1 प्रहर - 4 मुहूर्त’ - 8 घड़ी/7.5 घटी - 3 घंटे (10800 सेकंड)
1 दिन - 8 प्रहर - 30 मुहूर्त - 24 घंटे (86400 सेकंड)
विशेष: 1 दिन में कुल 30 मुहूर्त और एक मुहूर्त 2 घड़ी का होता है।

वैदिक ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंचमंडल क्रम वाली है - चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। यह उत्तरोत्तर मंडल का चक्कर लगा रहे हैं। चन्द्र मंडल द्वारा पृथ्वी का चक्र पूर्ण करने से दिन-रात बनते हैं। पृथ्वी मंडल से ऋतुएं, सूर्य मंडल से चतुर्युग, परमेष्ठी मंडल से मनवन्तर और स्वायम्भू मंडल का चक्र पूर्ण होने से कल्प का मान लिया जाता है। 

एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन होता है। 30 कल्प का मास और 12 मास का ब्रह्मवर्ष होता है। इस अनुमान से ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष होती है। ब्रह्मा की आयु के बराबर विष्णु का एक दिन होता है। इस आधार पर विष्णु की आयु 100 वर्ष है। विष्णु के 100 वर्ष शिवजी का एक दिन होता है। इस दिन और रात के अनुसार शिवजी की आयु 100 वर्ष होती है।