मनुष्य जीवन में समय सबसे अधिक मूल्यवान हैं। एक कहावत है कि बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य, खर्च किया गया धन तथा रूठा हुआ मित्र तो वापिस मिल सकता है, मगर जो समय निकल चुका है, वह कभी लौटकर वापिस नहीं आता। समय की सुई सभी के लिए एकसमान चलती हैं। वह छोटे-बड़े में भेद नहीं करती, न ही किसी का इन्तजार करती हैं। इसलिए जो समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी कद्र कभी नहीं करेगा। हिंदी के महान सन्त कबीरदास के दोहे से समय के महत्व को आसानी से समझा जा सकता हैं –

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

सर्वप्रथम हमें यह समझना चाहिए कि समय की संकल्पना की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके दो कारण समझ में आते हैं। पहला कि घटनाओं की पुनरावृत्ति ने प्रकृति के नियमित और व्यवस्थित होने के बारे में जानकारी दी होगी। दूसरा उन घटनाओं में आपसी भेद करने के लिए कि कौन-सी घटना पहले घटित हुई है और कौन सी घटना बाद में घटित हुई है? फलस्वरूप मनुष्य का ध्यान घटनाओं की अवधि और उनकी पुनरावृत्ति होने के अंतराल दोनों पर गया होगा। अतः नियमित और अनियमित घटनाओं और उनकी तुलनात्मक अवधि का अंतराल के सटीक अध्ययन से समय मापन की शुरुआत हुई होगी।

आदिकाल में मनुष्य ने सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर प्रातः, दोपहर, संध्या एवं रात्रि की कल्पना की। समय को सूक्ष्म रूप से नापने के लिए पहले घटी, पल की रचना हुई तत्पश्चात सूर्य-चन्द्र आदि ग्रहों की कक्षागतियों से पक्षों, महीनों, )तुओं तथा वर्षों की गणना की गई। इसी आधार पर पानी तथा बालू के घटीयंत्र बनाए गए। रात्रि के समय का ज्ञान नक्षत्रों से किया जाता था जो कि समय के प्रत्यक्ष स्थूल रूप हैं। समय की सूचना देने के लिए सभी प्रमुख शहरों में घड़ियालियों की नियुक्ति की जाती थी। यह घड़ियाली वो शख्स होते थे, जो पीतल की दो हाथ जितनी चैड़ी परातनुमा मोटी प्लेट पर लकड़ी के हथोड़े से प्रहार करके लोगों को समय की सूचना देते थे। पीतल की यह खास प्लेट किसी ऊंची जगह पर लटकायी जाती थी। एक समय घड़ी की गणना किसी खास बरतन में पानी भरने की प्रक्रिया के द्वारा की जाती थी।

वैदिक ऋषियों ने विज्ञान पर आधारित कैलेंडर या पंचांग बनाया, जिससे धरती और ब्रह्माण्ड का समय निर्धारण किया जा सकता है। यह निर्धारण करने के लिए उन्होंने घड़ी व पल के साथ एक सटीक ‘समय मापन पद्धति’ विकसित की थी। इस पद्धति से हमें जहां समय का ज्ञान होता है, वहीं हमें सभी जीव, जंतु, वृक्ष, मानव, ग्रह और नक्षत्रों की आयु का भी ज्ञान होता है। इनका वर्णन ज्योतिष की अति प्राचीन पुस्तकों जैसे पंचसिद्धांतिका तथा सूर्य सिद्धान्त में मिलता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार कालगणना कि मूल इकाई ‘त्रुटी’ है। ‘त्रुटी’ से ‘प्राण’ तक का समय अमूर्त एवं उसके बाद का समय मूर्त कहलाता है।

भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धान्त’ में समय के दो रूप बताये गए हैं –

1. अमूर्त काल – ऐसा सूक्ष्म समय जिसको न तो देखा जा सकता है और न ही इन सामान्य इन्द्रियों से उनको अनुभव ही किया जा सकता है। इसकी गणना भी सामान्य तरीको से नहीं की जा सकती। इनकी गणना विशेष प्रकार के यंत्रो से की जाती थी तथा इनका उपयोग भी कुछ विशेष शास्त्रों में हुआ है, जैसे वैमानिक शास्त्र और शल्य चिकित्सा शास्त्र और श्वास की गति आदि।

2. मूर्त काल – ऐसा समय जिसकी गणना संभव है एवं उसको, सामान्य इन्द्रियों से देखा और अनुभव भी किया जा सकता है। जैसे ग्रह, नक्षत्रों की गति।

भारतीय कालगणना कि विशेषता ही है कि यह अचूक एवं अत्यंत सूक्ष्म है। जिसमें त्रुटी से लेकर प्रलय तक कि गणना की जा सकती है। ऐसी सूक्ष्म कालगणना विश्व की किसी और सभ्यता या संस्कृति में नहीं मिलती चाहे आप कितना भी गहन अन्वेषण कर लीजिये। हिंदी व्याकरण में समय को गणनीय माना गया है जबकि अंग्रेजी व्याकरण में संज्ञा के रूप में समय और धन को अगणनीय ही मानते हैं।
घड़ी, पल या फिर क्षण जैसे शब्द भारत में हजारों वर्षों से कालगणना के मानक रहे हैं। एक दिन में आठ प्रहर होते हैं।

आधुनिक मान से एक प्रहर तीन घंटे का होता है। एक पहर में 8 घड़ीयां होती हैं, एक घड़ी लगभग 24 मिनट के बराबर होती है। एक घड़ी में साठ पल होते हैं। एक पल लगभग 24 सेकण्ड के बराबर होता है और एक पल में चैबीस क्षण होते हैं। एक क्षण लगभग 1 सेकंड का होता है। कहीं-कहीं पल को भी साठ हिस्सों में बांटा जाता था और साठवां हिस्सा कहलाता था विपल। एक विपल का मतलब होता था, उतना ही वक्त, जितना पलक के झपकने और खुलने में लगता है।

आपके मन में कभी न कभी यह प्रश्न जरूर उठा होगा कि जब मापन की अन्य इकाइयाँ, जैसे दूरी नापने की इकाई (मीटर, किलोमीटर आदि) तथा भार नापने की इकाई (ग्राम, किलोग्राम आदि), 10, 100, 1000 आदि के अंतर से बढ़ती या घटती हैं तो समय मापन की इकाई (जैसे सेकण्ड, मिनट, घंटे आदि) में केवल 60 का अंतर क्यों होता है?

ब्रिटिश समाचार पत्र ‘द गार्डियन’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार समय गणना के लिए 60 मानक की शुरुआत बेबीलाॅन के लोगों ने की होगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि बेबीलाॅन के लोगों ने अपने दाहिने हाथ के जरिए बांए हाथ की चार अंगुलियों के निशानों को अलग-अलग अंगुलियों और अंगूठे से गिना, ऐसा करने पर उनका जोड़ 60 आया। चूंकि वे 12 अंक को पवित्र मानते थे, इसलिए उन लोगों ने दिन और रात को इसी 12 अंक के आधार पर बांट दिया। उन्हें उस वक्त यह नहीं पता था कि पृथ्वी सूर्य का 24 घंटे में चक्कर लगाती है।

सके अतिरिक्त 60 ऐसी संख्या है, जो 2, 3, 4, 5, 6, 10, 12 जैसी कई संख्याओं से विभाजित होती है। ऐसे में संख्या 60 के आधार पर घंटा, मिनट और सेंकड को समझने में आसानी होती है।