हम जिस संसार में रहते हैं वह हमें बना बनाया मिला है। हमारे जन्म से पूर्व इस संसार में हमारे माता-पिता व पूर्वज रहते आए हैं। हमें ना तो हमारे माता-पिता से और ना अपने अध्यापकों व विद्यालीय पुस्तकों में इस बात का ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह संसार कब, किसने व क्यों बनाया है। जिस कारण मनुष्य न केवल इन प्रश्नों के उत्तर से वंचित व अनभिज्ञ हो गया, अपितु ईश्वर व जीवात्मा के सच्चे ज्ञान से दूर होकर अन्धविश्वासों और कुरीतियों से ग्रसित हो गया। काफी समय से हमारे देश के लोगों ने वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन करना भी छोड़ दिया है। वेदों में सृष्टि रचना को जिस वैज्ञानिक तरीके से समझाया गया है और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का जो सिद्धान्त बताया है, आधुनिक विज्ञान आज उसके नजदीक पहुंच गया है। अब लोगों को कहानी से ज्यादा तथ्य पर विश्वास होता है। यहां सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धान्त को समझने का प्रयास करते हैं।

यह ब्रह्माण्ड अंडाकार है और जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। यह जल से भी दस गुना ज्यादा अग्नि तत्त्व से घिरा हुआ है और इससे भी दस गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना गया है। यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड ही प्रकृति कही गई है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्त्व हैं। इसे ही शक्ति कहते हैं। आप पांच तत्त्वों को तो जानते ही हैं – जोकि आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के नाम से जाने जाते है। हमारा शरीर भी इन्ही तत्त्वों के मेल से बना है। आकाश का गुण शब्द, वायु का गुण गंध, अग्नि का गुण रूप, जल का गुण रस तथा पृथ्वी का गुण स्पर्श है। अपने उद्भव के बाद सभी वस्तुएं नश्वरता को प्राप्त होकर इनमें ही विलीन हो जाती है। मरने के बाद यह तत्त्व प्रकृति में विलिन हो जाते हैं। प्रकृति का ब्रह्म में लय (लीन) हो जाना ही प्रलय है।

आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्नि, अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औषधियों से अन्न, अन्न से तेज, तेज से पुरुष अर्थात् शरीर उत्पन्न होता है। – तैत्तिरीय उपनिषद।

ब्रह्माण्ड में प्रकृति से उत्पन्न सभी जीवों में इनकी मात्रा भिन्न-भिन्न होती हैऋ जैसे हाथी में मिट्टी तत्त्व की मात्रा अधिक होने के कारण उसका शरीर भारी होता है और पक्षियों में वायु तत्त्व की अधिकता के कारण उनका वजन कम होता है जिससे वह हवा में उड़ सकते हैं। इसी प्रकार सांप जैसे रेंगने वाले जीवों में अग्नि तत्त्व की प्रधानता होती है क्योंकि अग्नि का स्वभाव तीव्रता से फैलना होता है।

जीवन के लिए आवश्यक पांच तत्त्वों का महत्त्व :

1. आकाश : आकाश एक अनुमान है जोकि दिखाई देता है लेकिन पकड़ में नहीं आता। धरती के एक सूत ऊपर से, ऊपर जहां तक नजर जाती है उसे आकाश ही माना जाता है। खाली स्थान को अवकाश कहते हैं। अवकाश था तभी आकाश और अंतरिक्ष की उत्पत्ति हुई। यह उन तत्त्वों के निर्माण के लिए जरूरी है, जो हल्की और सघन प्रकृति के होते हैं। यह बताता है कि हमें हमारे रिश्तों, विचारों आदि के बीच कुछ जगह कैसे बनाए रखी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हमारे जोड़ों के बीच की जगह किसी प्रकार कम हो जाती है, तो हमें जोड़ों का दर्द महसूस होता है। इसी तरह, यदि विचारों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव हो जाता है, तो यह हमारे रिश्तों को प्रभावित कर सकता है। अंतरिक्ष में आठ प्रकार की वायु बहती है जो निम्न प्रकार से है –

1 और 2. प्रवह – पृथ्वी के वायुमण्डल में उपस्थित हवा ठण्डी और गर्म, दो हैं, जिससे बादलों को गति मिलती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह वायु समुद्र के जल से पूर्ण करती है।
3. आवह – सूर्य के आसपास का वायुमण्डल, जिससे सूर्य को गति मिलती है।
4. उद्वह – चन्द्रमा के आसपास का वायुमण्डल, जिससे चन्द्र को गति मिलती है।
5. संवह – नक्षत्रों के आसपास का वायुमण्डल, जिससे नक्षत्रों को गति मिलती है।
6. विवह – ग्रहों के आसपास का वायुमण्डल, जिससे ग्रहों को गति मिलती है।
7. परिवह – सप्तर्षिमंडल के आसपास का वायुमण्डल, जिससे तारों को गति मिलती है।
8. परावह – ध्रुवों के आसपास का वायुमण्डल, जिससे धु्रवों को गति मिलती है।

2. वायु : आकाश से वायु की उत्पत्ति हुई। वायु को ब्रह्माण्ड का प्राण और आयु भी कहा जाता है। यह तत्त्व शरीर की गति से भी जुड़ा है, जैसे नाड़ी गति, सभी संवेदी और तंत्रिका संबंधी गतिविधियां, श्वसन क्रिया, आंखों का खुलना और बंद होना आदि। यदि जीवन में वायु की मात्रा कम होती है, तो इसके परिणामस्वरूप विचारों की कमी, कोई आंतरिक रूकावट, कम रक्तचाप, आलस्य, रिश्ते में रूचि की कमी होने की सम्भावना बनी रहती है। हमारे शरीर में स्थित वायु दस प्रकार की होती है, जिनमें पांच प्रमुख होती हैं। प्रथम पांच को महाप्राण और अन्तिम पांच को लघु प्राण कहते हैं :

1. प्राण वायु – यह हृदय और फेफड़ों में होती है। इसका कार्य श्वास को गति प्रदान करना है।
2. अपान वायु – यह हमारी आंतों में बहती है। इसका कार्य मल-त्याग में सहायता करना है।
3. समान वायु – यह रक्त वाहिकाओं में होती है। इसका कार्य शरीर में रस पहुंचाने का है।
4. व्यान वायु – यह आंख, कान, नाक में होती है। यह हमारे दैनिक कार्यों में सहायक है।
5. उदान वायु – यह नाभि चक्र में होती है। इसके द्वारा ब्रह्मकुण्ड में उत्पन्न अमृत समान वायु तक पहुंचता है।
6. नाग वायु – यह गले एवं श्वासनली में स्थित रहकर ध्वनि उत्पन्न करने में सहायक है।
7. कुर्म वायु – यह हमारी चमड़ी में स्थित रहकर पसीने का संचार करती है।
8. कृकाल वायु – यह हमारी मांसपेशियों और हड्डियों को लचक और स्थिरता प्रदान करती है।
9. देवदत्त वायु – यह मांस में स्थित रहकर शरीर को उचित आकार प्रदान करती है।
10. धनंजय वायु – यह मस्तिष्क में स्थित होकर समस्त शारीरिक क्रियाओं का संचालन करती है।

3. अग्नि : वायु में ही अग्नि और जल तत्त्व छुपे हुए रूप में रहते हैं। वायु ठंडी होकर जल बन जाती है गर्म होकर अग्नि का रूप धारण कर लेती है। वायु का वायु से घर्षण होने से अग्नि की उत्पत्ति हुई। अग्नि की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी घटना थी। अग्नि उन अंगों के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो उग्र और तीव्र प्रकृति के हैं, जैसे दृष्टि, नजर, शरीर की ऊष्मा, तापमान, रंग, चमक, क्रोध, साहस आदि इसकी कमी है तो यह भूख न लगना और मधुमेह का कारण बन सकती है।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में स्थित अग्नि 13 प्रकार की होती है: (1) जठराग्नि, (2) भौमाग्नि, (3) आप्याग्नि, (4) आग्नेयाग्नि, (5) वायव्याग्नि, (6) आकाश्याग्नि, (7) रसाग्नि, (8) रक्ताग्नि, (9) मांसाग्नि, (10) मेदोग्नि, (11) अस्थियाग्नि, (12) मज्जाग्नि, (13) शुक्राग्नि।

4. जल : वायु जब विराट अग्नि के गोले में बदल गई तो उसी में जल तत्त्व की उत्पत्ति हुई। वैज्ञानिकों के अनुसार अंतरिक्ष में आज भी बिना धरती (आधार) के समुद्र घुम रहे हैं। पानी बहुत ही लचीला होता है और किसी भी सांचे में डालने पर उसका रूप ले सकता है। पानी की कमी से शरीर में सूखापन आ जाता है। पानी की अधिकता से शरीर में सूजन हो सकती है।
हमारे आसपास मिलने वाला पानी नौ प्रकार का होता है: (1) ग्लेशियर (बर्फ के पहाड़), (2) पहाड़ों से निकलने वाली नदियां, (3) समुद्र का पानी (महासागर), (4) नहर का पानी (वाटर सप्लाई), (5) जमीन का पानी (नलकूप), (6) वर्षा का पानी (जोहड़, तालाब), (7) ट्यूबवैल का पानी (कुआं), (8) एन्क्लाईव वाटर (उपचारित पानी), (9) गर्म पानी के चश्मे (प्राकृतिक रूप से उपचारित)।

5. धरती : जल से धरती की उत्पत्ति हुई। जलता हुआ जल का गोला कहीं जमकर बर्फ बना तो कहीं भयानक अग्नि के कारण काला कार्बन होकर धरती बनता गया अर्थात् ज्वालामुखी बनकर ठंडा होते गया। इस कारण धरती आज भी भीतर से जल रही है और हजारों किलोमीटर तक बर्फ भी जमी है। पृथ्वी की ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा या मिट्टी कहते हैं। मिट्टी में विभिन्न प्रकार के कण रहते हैं जो कठोर, भारी और स्थिर है। पृथ्वी या मिट्टी हमारे शरीर में हड्डी, दांत, मांस, त्वचा, बाल आदि के निर्माण से जुड़ी है।

पृथ्वी पर पाई जाने वाली मिट्टी दो प्रकार की होती है – शुष्क मिट्टी और गीली मिट्टी। शुष्क मिट्टी शुष्क कणों के रूप में मिलती है तथा गीली मिट्टी नदियों के प्रवाह से निर्मित समतल मैदान (जलोढ़, दोमट, काली), पठारी भूमि (लाल), पथरीली (लैटेराइट), पहाड़ी (पर्वतीय) आदि रूपों में मिलती है। मैदानी मिट्टी में अनाज, फल, सब्जी; लाल मिट्टी में तम्बाकू; पथरीली भूमि पर चाय, कहवा, रबड़; मरूस्थलीय मिट्टी में बाजरा, चना, दलहन तथा पर्वतीय मिट्टी में सेब, नाशपति आदि फसलें उगाई जाती हैं।