सृष्टि कालखण्ड एवं प्रलय
सृष्टि की उत्पत्ति एवं कालखण्ड के बारे में सभी मत, पंथ, सम्प्रदायों की अपनी-अपनी मान्यता है। कुरान का अपना मत है, बाइबिल का अपना और भी बहुत मत-मतान्तर के लोग अपने-अपने मत को अहमियत देते हैं। संसार की सबसे पुरानी पुस्तक )ग्वेद में सृष्टि कालखण्ड का विस्तृत वर्णन दिया गया है। वेद मुख्यतः चार हैं जो ब्रह्मा द्वारा रचे गए हैं – ऋग्वेद, अर्थववेद, यजुर्वेद और सामवेद। मानव सृष्टि के साथ ही ब्रह्मा जी ने सात ऋषियों को वेदों का ज्ञान दिया और तभी से यह सृष्टि संवत् चला। चूँकि आर्य अर्थात् ‘श्रेष्ठ’ लोग आदिमानव के आर्य वंशज है और आज भी वैदिक संस्कृति व सभ्यता के ध्वजवाहक हैं, इसलिए आर्य लोग सृष्टि संवत् को वेद संवत् तथा आर्य संवत् के नाम से पुकारते हैं।
पंडित लोग सदियों से हवन-पूजन आदि में जब संकल्प कराते हैं तो निम्नलिखित संस्कृत वाक्य बोलते हैं। इसमें केवल संवत्सर, मास, तिथि और स्थान का ही परिवर्तन होता है। यह संस्कृत वाक्य यह दर्शाता है कि अब तक कितना समय बीत चुका है –
‘‘ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणां द्वितीये परार्धे, श्वेत वाराह कल्पे, वैवस्वत मन्वंतरे, अष्टाविंशति तमे कलियुगे प्रथमचरणे, कलिसंवते या युगाब्दे, जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे, आर्याव्रते, ….. संवत्सरे, …. अयने, ….. ऋतौ, ….. मासे, ….. पक्षे, ….. तिथये, ….. समये यथा जातके …..’’ इस प्रकार अपना नाम, पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन-सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करते हैं।
महर्षि दयानन्द जो आर्य समाज के एक महान् ऋषि हुए हैं, उन्होंने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में संसार की उत्पत्ति से अब तक एक-एक दिन की गणना लिखी है। स्वामी जी ने सृष्टि उत्पत्ति काल की गणना उस समय से की है, जब मनुष्य उत्पन्न हुआ। परन्तु सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति होने तक व्यतीत काल को उन्होंने गणना में नहीं लिया। यह समय 6 चतुर्युगी के बराबर माना गया है। इस गणना के अनुसार इस समय सातवें मनवन्तर वैवस्वत की 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है। इस चतुर्युगी में कलयुग के 5118 वर्ष बीत चुके है। उन्होंने यह सिद्ध भी किया है कि विक्रम संवत् 2074 के चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (28 मार्च, 2017) को सृष्टि के 1,97,29,49,118 वर्ष बीत चुके हैं, जिसकी गणना निम्न प्रकार है :
1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष
(सतयुग-17,28,000 + त्रेतायुग-12,96,000 + द्वापरयुग-8,64,000 + कलियुग-4,32,000)
1 मनवन्तर = 71 चतुर्युग = 30,67,20,000 वर्ष
1 कल्प = 14 मन्वंतर (4,29,40,80,000) + 15 संध्यांश (2,59,20,000) = 4,32,00,00,000 वर्ष
अब तक बीते 6 मनवन्तर = 30,67,20,000 6 = 1,84,03,20,000 वर्ष
अब तक बीते 7 संध्यांश = 17,28,000 7 = 1,20,96,000 वर्ष
सातवें मनवन्तर के 27 चतुर्युग = 43,20,000 27 = 11,66,40,000 वर्ष
28वें चतुर्युग का बीता समय = 38,93,118 वर्ष
(सतयुग-17,28,000 + त्रेतायुग-12,96,000 + द्वापरयुग-8,64,000 + कलियुग-5118, शेष 4,26,882)
अतः वर्तमान सृष्टि का समय = 1,97,29,49,118 वर्ष
उपरोक्त गणना के अनुसार वर्तमान में (संवत् 2078 तक) सृष्टि रचना के 1,97,29,49,118 वर्ष बीत चुके है। अभी मानव सृष्टि 2,34,70,50,882 वर्ष और रहेगी, इसके पश्चात् प्रलय होगा।
चतुर्युग वर्णन : युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। मानवीय गणना के अनुसार चार युगों का एक महायुग होता है, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष होती है। एक चतुर्युग/महायुग के 10 चरणों को क्रमशः 4, 3, 2, 1 के अनुपात में बांटा गया है। एक चरण की अवधि 4,32,000 वर्ष होती है। इतनी अवधि में सभी नौ ग्रह अपना-अपना भ्रमणकाल पूर्ण करके एक साथ एकत्रित होते हैं। इस युति के काल को कलियुग कहा गया। दो युति को द्वापर, तीन युति को त्रेता तथा चार युति को सतयुग कहा गया। प्रत्येक चतुर्युगी के अन्त में भी सातों ग्रह एक ही दिशा में आते हैं। प्रत्येक युग में व्यक्ति की आयु एवं लम्बाई अलग-अलग होती है एवं उनमें होने वाले अवतारों का परिचय होता है।
चारों युगों की सामान्य जानकारी इस प्रकार है –
1. सतयुग : सतयुग का मान 4800 दैवीय वर्ष या 17,28,000 सौर वर्ष होता है। सतयुग का प्रारम्भ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि से होता है जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। सतयुग में धर्म अपने चारों चरणों सत्य, तप, पवित्रता और दान में विद्यमान रहता है। सतयुग में मनुष्य की आयु एक लाख वर्ष और लम्बाई 24 फुट होती है। सतयुग में जन्म लेने वाले कुछ ऋषि त्रेतायुग और द्वापरयुग के अन्त तक विद्यमान थे। इस युग में भगवान विष्णु के मत्स्य, वराह, नरसिंह और कूर्म आदि चार अवतार हुए।
2. त्रेतायुग : त्रेतायुग का मान 3600 दैवीय वर्ष या 12,96,000 सौर वर्ष होता है। इस युग का प्रारम्भ वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से होता है जिसे अक्षय तृतीया या आखा तीज भी कहा जाता है। त्रेतायुग में सत्य का लोप हो जाता है और धर्म अपने तीन चरणों में विद्यमान रहता है। यह तीन चरण हैं – तप, पवित्रता और दान। त्रेतायुग में मनुष्य की आयु 10 हजार वर्ष और लम्बाई 18 फुट होती है। इस युग में भगवान विष्णु के वामन, परशुराम और श्रीराम आदि तीन पूर्ण अवतार हुए।
3. द्वापरयुग : द्वापरयुग का मान 2400 दिव्य वर्ष या 8,64,000 मानव वर्ष होता है। इसका प्रारम्भ माघ मास की पूर्णिमा तिथि से होता है। द्वापरयुग में धर्म के केवल दो चरण ‘पवित्रता और दान’ रह जाते हैं। इसमें मनुष्य की आयु 1000 वर्ष और लम्बाई 12 फुट होती है। इस युग में केवल दो अवतार श्रीकृष्ण और महात्मा बुद्ध हुए हैं।
4. कलयुग : कलयुग का मान 1200 दिव्य वर्ष या 4,32,000 मानव वर्ष होता है। कलयुग का प्रारम्भ आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से होता है। कलयुग में धर्म अपने एक चरण ‘दान’ पर विद्यमान रहता है। इसलिए कलयुग में दान का अत्यधिक महत्व बताया गया है। इस युग में मनुष्य की आयु 100 वर्ष और लम्बाई केवल 6 फुट रह जाती है। इस युग का एकमात्र अवतार ‘कल्कि’ कलयुग के अन्त में होगा।
मनवन्तर क्या है : वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंचमंडल क्रम वाली है – चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल, जो अन्तरिक्ष में उत्तरोत्तर एक-दूसरे का चक्कर लगा रहे हैं। सृष्टि की आयु का अनुमान लगाने के लिये चार युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) का एक चतुर्युग अथवा महायुग माना जाता है। 71 महायुग मिलकर एक मनवन्तर बनता है। सूर्य मंडल के परमेष्ठी मंडल ‘आकाश गंगा’ के केंद्र का चक्र पूरा होने पर उसे मनवन्तर काल कहा गया। एक मनवन्तर में 30,67,20,000 वर्ष होते हैं। 14 मनवन्तरों का एक कल्प होता है। एक कल्प में 4,32,00,00,000 वर्ष होते हैं। ब्रह्मा के एक दिन को कल्प का नाम दिया गया है।
प्रलय का अर्थ : प्रलय का अर्थ होता है संसार का अपने मूल कारण प्रकृति में सर्वथा लीन हो जाना। प्रकृति का ब्रह्म में लय ;लीनद्ध हो जाना ही प्रलय है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी तय है। जिसका उदय होता है, उसका अस्त होना भी तय है, ताकि फिर उदय हो सके। यही सृष्टि चक्र है। शास्त्रों में मूल रूप से प्रलय के चार प्रकार बताए गए – पहला, कलयुग के अन्त में धरती से जीवन का समाप्त हो जाना (43,20,000 वर्ष), दूसरा, मन्वंतर के अन्त में धरती का नष्ट होकर भस्म बन जाना (30,76,20,000 वर्ष), तीसरा, कल्प के अन्त में सूर्य सहित ग्रह-नक्षत्रों का नष्ट होकर भस्मीभूत हो जाना (4,32,00,00,000 वर्ष) और चौथा, भस्म का ब्रह्म में लीन हो जाना (अन्तिम सन्ध्यांश-17,28,000 वर्ष) अर्थात् फिर भस्म भी नहीं रहे, पुनः शून्यावस्था में हो जाना। इस विनाश लीला को क्रमशः नित्य, आत्यन्तिक, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलय में बांटा गया है।
श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध में श्री शुकदेव जी परीक्षित जी से कहते हैं कि ज्यों-ज्यों घोर कलयुग आता जाएगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरण शक्ति का लोप होता जाएगा। मनुष्य की परम आयु केवल 20 या 30 वर्ष होगी। चारों वर्णों के लोग क्षुद्रों (बौने) के समान हो जाएंगे। गाएं भी बकरियों की तरह छोटी-छोटी और कम दूध देने वाली हो जाएंगी। मनुष्यों का स्वभाव गधों जैसा हो जाएगा। कलियुग के अंत में वर्षा नहीं होगी, भयंकर तूफान और भूकंप ही चला करेंगे। सूर्य का तेज बढ़ने से समुद्र और नदियां सूख जाएंगी। लोग मकानों में नहीं बल्कि जमीन में गड्ढे खोदकर रहेंगे। धरती का तीन हाथ अंश अर्थात् लगभग साढ़े चार फुट नीचे तक धरती का उपजाऊ अंश नष्ट हो जाएगा।