मापन प्रणाली का संक्षिप्त परिचय
भारत में विभिन्न कालों में नापतोल की भिन्न-भिन्न पद्धतियाँ प्रचलित रही हैं। वर्तमान भारत में मापन की अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली (SI) प्रचलित है। 1947 से पहले अंग्रेजों की ब्रिटिश प्रणाली लागू थी। इसके पूर्व मुगलशासक अकबर ने एक अन्य प्रणाली लागू की थी, किन्तु अकबर से भी पहले भारत में एक अन्य प्रणाली प्रचलित थी। किसी भौतिक राशि का परिमाण संख्याओं में व्यक्त करने को मापन कहा जाता है। मापन मूलतः तुलना करने की एक प्रक्रिया है। मापन के चार उपकरण मीटर, किलोग्राम, सेकंड व लीटर है। उदाहरण के लिये जब हम कहते हैं कि किसी पेड़ की उँचाई 10 मीटर है तो हम उस पेड़ की ऊंचाई की तुलना एक मीटर से कर रहे होते हैं। यहाँ मीटर एक मानक मात्रक है जो भौतिक राशि लम्बाई या दूरी के लिये प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार समय का मात्रक सेकण्ड, भार/वजन का मात्रक किलोग्राम और तरल पदार्थों का मात्रक लीटर होता है। समय के लिए वृक्षों की छाया नापने से लेकर कोणार्क के सूर्य मन्दिर के चक्र तक अनेक मापन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता रहा है। मनुस्मृति के 8वें अध्याय के 403वें श्लोक में कहा गया है :-
तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात् सुलक्षितं।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत्।।
अर्थ – राजा को प्रति छः माह पश्चात् भारों (बाटों) तथा तुला (तराजू) की सत्यता सुनिश्चित करके राजकीय मुहर द्वारा सत्यापित करना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि नापतोल की पद्धतियाँ प्राचीनकाल से ही रही हैं।
मीट्रिक प्रणाली का संक्षिप्त इतिहास :
मीट्रिक प्रणाली का इतिहास ज्ञानोदय युग के दौरान शुरू हुआ, जिसमें लंबाई और वजन के माप प्रकृति से प्राप्त किए गए थे, यह प्रणाली आधी सदी के भीतर फ्रांस और यूरोप की मानक प्रणाली बन गई। ज्ञानोदय का युग, जिसे ‘तर्क का युग’ या मात्र ‘ज्ञानोदय’ भी कहा जाता है, यूरोप और पश्चिमी सभ्यता में बौद्धिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष का एक काल था, ज्ञानोदय का उदय 16वीं और 17वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से हुआ और उसी पर आधारित था, जिसने गैलीलियो गैलीली, जोहान्स केप्लर, फ्रांसिस बेकन, पियरे गैस्सेंडी, क्रिस्टियान ह्यूजेन्स और आइजैक न्यूटन जैसे विद्वानों के कार्यों के माध्यम से अनुभवजन्य जांच की नई पद्धतियों की स्थापना की थी।
मीट्रिक प्रणाली का सर्वप्रथम वर्णन 1668 में किया गया था और इसे फ्रांस द्वारा आधिकारिक तौर पर 1799 में अपनाया गया था। मीट्रिक प्रणाली का पहला व्यावहारिक उपयोग 1799 में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हुआ, जब व्यापार के लिए मौजूदा माप प्रणाली अव्यावहारिक हो गई और उसकी जगह किलोग्राम और मीटर पर आधारित दशमलव प्रणाली लागू की गई। बुनियादी इकाइयाँ प्राकृतिक जगत से ली गई थीं। लंबाई की इकाई, मीटर, पृथ्वी के आयामों पर आधारित थी, और द्रव्यमान की इकाई, किलोग्राम, एक लीटर पानी के द्रव्यमान पर आधारित थी। मीटर, लंबाई के लिए परिभाषित किया गया है। यह उत्तरी ध्रुव और भूमध्य रेखा के बीच पेरिस से होकर गुजरने वाली दूरी का एक करोड़वां हिस्सा है।
उत्पत्ति और उद्देश्य – 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद, पूरे फ्रांस में माप की एक समान और तर्कसंगत प्रणाली की आवश्यकता महसूस की गई, क्योंकि उस समय अलग-अलग क्षेत्रों में 400 से अधिक विभिन्न माप प्रणालियाँ मौजूद थीं। 1790 में, फ्रांसीसी नेशनल असेंबली ने पेरिस एकेडमी आॅफ साइंसेज को एक ऐसी प्रणाली विकसित करने का कार्य सौंपा जो प्रकृति पर आधारित हो और जिसे 10 की घात (दशमलव) पर समझा जा सके। प्राकृति आधारित प्रणाली को वैज्ञानिक आधार देने के लिए, ‘मीटर’ को उत्तरी ध्रुव और भूमध्य रेखा के बीच की दूरी के एक करोड़वें हिस्से के रूप में परिभाषित किया गया था। फ्रांस ने आधिकारिक तौर पर 1795 में मीट्रिक प्रणाली को अपनाया और 1799 में इसे पूरी तरह से लागू किया। नेपोलियन के शासनकाल के दौरान, यह प्रणाली फ्रांस से बाहर यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में फैली।
मीट्रिक प्रणाली की मुख्य विशेषताएं –
मापन के 20वीं शताब्दी के इतिहास को पाँच अवधियों में विभाजित किया गया है – 1901 में सुसंगत MKS प्रणाली की परिभाषाएं MKS, CGS और मापन की सामान्य प्रणालियों के सह-अस्तित्व के मध्यवर्ती 50 वर्ष। 1948 में SI के व्यावहारिक इकाई प्रणाली प्रोटोटाइप। 1960 में SI का परिचय और उत्तरार्ध शताब्दी में SI का विकास। 19वीं और 20वीं शताब्दियों में, यह विश्व स्तर पर प्रमुख प्रणाली बन गई। दशमलव प्रणाली (Decimal System) मीट्रिक प्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, जिसमें केवल एक आधार इकाई होती है और दशमलव आधार पर गुणज बनाए जाते हैं, जिससे अंक समान रहते हैं। दशमलव संख्याओं में सभी माप 10 के गुणकों 10, 100, 1000 आदि में होते हैं, जिससे गणना करना आसान होता है। आज, संयुक्त राज्य अमेरिका, लाइबेरिया और म्यांमार को छोड़कर, दुनिया के लगभग हर देश में मीट्रिक प्रणाली ही आधिकारिक माप प्रणाली है। अंतर-संबंधित इकाइयाँ, लंबाई (मीटर), द्रव्यमान (ग्राम), और आयतन (लीटर) के बीच एक तार्किक संबंध है।
देसी नाप तोल की जानकारी :
हमें स्कूल में सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय (SI) मापन पद्धति या अंग्रेजी नापतोल प्रणाली सिखाई जाती है। देसी नापतोल की जानकारी के बिना कभी-कभी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सिर्फ गाँवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी नापतोल के कुछ देसी शब्द सुनने को मिलते हैं, जिन्हें सुनकर ना सिर्फ कंफ्यूजन होता है बल्कि थोड़ी शर्मिंदगी भी होती है। हमने स्कूल और काॅलेज की पढ़ाई चाहे कितनी भी कर ली हो, लेकिन कहीं भी हमें बीघा, किला, तोला, पंसेरी, कौड़ी, गज, जरीब, मन, कोस आदि का मतलब नहीं पढ़ाया जाता। इस वजह से हम देसी नापतोल से अनजान बने रहते हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में तो बच्चों को हिंदी की गिनती भी नहीं सिखाई जाती, जिसके कारण उन्हें हिंदी में बोला गया फोन नम्बर भी इंग्लिश में पूछना पड़ता है। हमारे सभी त्यौहार देसी महीनों के हिसाब से आते है। लेकिन उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी हमें उनके नाम तक पता नहीं होते। इसके कारण संशय बना रहता है। हमें इन सबकी जानकारी होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी संस्कृति से अनजान ना रहे।
यह कहना अत्यन्त कठिन है कि नापतोल पद्धति का आविष्कार कब और कैसे हुआ? किन्तु अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य के बौद्धिक विकास के साथ ही आपसी लेन-देन की परम्परा आरम्भ हुई होगी। अति प्राचीन काल से ही दोनों का विकास साथ-साथ हुआ होगा। लगभग सभी प्राचीन भारतीय गणितज्ञों ने अपने ग्रन्थों में मापन की इकाईयों एवं मापन यन्त्रों का वर्णन किया है। ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त के 22वें अध्याय का नाम ‘यन्त्राध्याय’ है। संस्कृत के शुल्ब शब्द का अर्थ नापने की रस्सी या डोरी होता है। अपने नाम के अनुसार शुल्ब सूत्रों में यज्ञ-वेदियों को नापना, उनके लिए स्थान का चुनना तथा उनके निर्माण आदि विषयों का विस्तृत वर्णन है।
जरीब क्या है : जरीब, लोहे की कड़ियों की बनी जंजीर होती है जिसके दोनों सिरों पर पीतल के हैंडल बने होते हैं। एक जरीब की मानक लम्बाई 66 फीट ;22 गजद्ध या 4 लट्ठे (Rods) होती है और एक-एक फुट पर निशान लगा होता है। एक जरीब में कुल 100 कड़ियाँ होती हैं, प्रत्येक कड़ी की लम्बाई 0.6 फुट या 7.92 इंच होती है। लम्बाई की दृष्टि से जरीब तीन प्रकार की होती है – 10 मीटर, 20 मीटर तथा 30 मीटर। इनमें क्रमशः 50 कड़ी, 100 कड़ी तथा 150 कड़ी होती हैं। 100 कड़ी की 10 जरीब 1 फर्लांग के बराबर और 80 जरीब की दूरी 1 मील के बराबर होती है। आधुनिक मान से एक मील में 1.609 किलोमीटर होते हैं।
बीघा क्या है : बीघा, भारत में भूमि ;जमीनद्ध नापने की एक पारंपरिक इकाई है। बीघा भारत के विभिन्न राज्यों और अक्सर एक ही राज्य के भीतर के क्षेत्रों में विभिन्न आकार के बीघा पाए जाते हैं। बीघा का माप हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार में कच्चा: 1008.33 वर्ग गज और पक्का: 3025 वर्ग गज होता है। गुजरात, राजस्थान में 1936 वर्ग गज, हिमाचल, उत्तराखंड में 900-968 वर्ग गज और मध्य प्रदेश में 1033.33 वर्ग गज होता है। भारत के अधिकांश भागों में खेतों के नाप के लिए गज, हाथ, गट्ठा, जरीब, उनवांसी, कचवांसी, बिस्वांसी, बिस्वा, मरला, कनाल, बीघा, किल्ला आदि मात्रकों का प्रयोग होता हैं। इनके मान पूरे देश में अलग होते हैं। 1 उनवांसी 24.5 वर्ग ईंच का होता है। 20 उनवांसी के बराबर 1 कचवांसी, 20 कचवांसी के बराबर 1 बिस्वांसी और 20 बिस्वांसी के बराबर 1 बिस्वा का माप होता है। 20 बिस्वा के बराबर एक पक्का बीघा होता है। (सन्दर्भ Knowledge Planet)