कुण्डलिनी शक्ति
सम्पूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक क्रिया उर्जा द्वारा निर्मित एवं संचालित होती है, जिसमें मानव शरीर भी शामिल है। आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के आने के पहले से हमारी संस्कृति में यह मान्यता रही है कि हर जीव एक शक्ति से संचालित होता है, जो उसके अंदर विद्यमान होती है। मानव शरीर में इस शक्ति को सात चक्र के रूप में व्यक्त किया गया है। मेरुदण्ड को राजमार्ग कहते हैं। इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया है। इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं। हिन्दू धर्म के भू, भुव, स्व, जप, तप, मह, सत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध है। आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है। इन विराम स्थलों को ‘चक्र’ कहा गया है। मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को सिद्धियों का केन्द्र माना गया है। इनको जागृत करने के लिए श्रद्धा और विश्वास की आवश्यकता होती है। इनका अभ्यास किसी कुशल साधक के सरंक्षण में करना चाहिए नहीं तो अनिष्ट भी हो सकता है।
चक्र एक संस्कृत शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पहिया। मानव शरीर में शक्ति, जिसे प्राण भी कहते हैं, शरीर के अंदर पहिये की तरह ही घूमती है। इस शक्ति के 7 केंद्र या आधार हैं। पहला चक्र रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग में होता है, फिर ऊपर की तरफ चलते हुए सातवां और आखिरी चक्र मस्तिष्क में होता है। इसी को दार्शनिक भाषा में शिव एवं शक्ति का संगम भी कहा जाता है। शिव क्षेत्र सहस्रार तथा शक्ति क्षेत्र मूलाधार कहा गया है। इन्हें परस्पर जोड़ने वाली, परिभ्रमणिका शक्ति का नाम कुण्डलिनी है। यह सातों चक्र एक स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को ऊर्जा देते हैं। हालांकि, अगर आपका कोई भी एक चक्र ठीक से कार्य नहीं करता है, तो इससे आपके स्वास्थ पर असर पड़ सकता है।
आइये आपको बताते हैं, मानव शरीर में मौजूद 7 चक्रों के बारे में –
1. मूलाधार चक्र : मूलाधार दो शब्दों से बना है – ‘मूल’ मतलब जड़ और ‘आधार’ मतलब सहारा। इस चक्र का कार्य पृथ्वी के साथ आपकी ऊर्जा को जोड़ना है। मूलाधार चक्र वह चक्र है जहाँ पर शरीर का संचालन वाली कुण्डलिनी शक्ति से युक्त ‘मूल’ आधारित अथवा स्थित है। मूलाधार चक्र आपके जीवन के संघर्ष से संबंध रखता है। यह चक्र शरीर के अन्तर्गत गुदा और लिंग मूल के मध्य में स्थित है जो अन्य स्थानों से कुछ उभरा सा महसूस होता है। मूलाधार चक्र से पैसा, भोजन और नींद आदि की समस्याएं खत्म होती हैं और जीवन से आर्थिक कठिनाइयाँ कम होती हैं। मूलाधार चक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है। इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है। इसके अन्दर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की स, ष, श, व से युक्त चार पंखुडियाँ नियत हैं। यहाँ के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं।
2. स्वाधिष्ठान चक्र : स्वाधिष्ठान का अर्थ है खुद की जगह। यह चक्र आपकी पहचान बताता है। इस चक्र का अभ्यास करने से आपके जीवन में एक आनंदमय ऊर्जा आती है। स्वाधिष्ठान चक्र आपको एक रचनात्मक ऊर्जा देता है, जिसकी मदद से आप अपने जीवन को खुशहाल तरीके से जीने लगते हैं। यह चक्र सुखद गतिविधियों के लिए आपको प्रेरित करता है। स्वाधिष्ठान चक्र पेट के निचले क्षेत्र में स्थित होता है। इस चक्र को जागृत करने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। स्वाधिष्ठान चक्र के छः दल हैं, जो पंखुड़ियाँ कहलाती हैं। यह चक्र सूर्य वर्ण का होता है जिसके छः अक्षर होते हैं जैसे- य, र, य, म, भ, ब। इस चक्र के अभीष्ट देवता इन्द्र नियत हैं। इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है।
3. मणिपुर चक्र : मणिपुर चक्र का अर्थ है उज्जवल रत्न। इस चक्र में आपके आत्मविश्वास और पहचान का जन्म होता है। इस चक्र से आपको खुद से निर्णय लेने की समझ और शक्ति मिलती है, खुद की एक पहचान बनाने की हिम्मत मिलती है और हर काम को पूरा करने की ताकत भी। मणिपुर चक्र पेट के ऊपरी क्षेत्र में स्थित होता है। नाभि मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अन्तर्गत मणिपूरक नामक तीसरा चक्र है, जो दस दल कमल पंखुनियों से युक्त है जिस पर स्वर्णिम वर्ण के दस अक्षर बराबर कायम रहते हैं। वे अक्षर फ, प, न, ध, द, थ, त, ण, ढ एवं ड हैं। इस चक्र के अभीष्ट देवता ब्रह्मा जी हैं।
4. अनाहत चक्र : अनाहत चक्र का अर्थ है प्यार देने वाला । इस चक्र में आप कुछ न कुछ नया करने की सोचते हैं। इस चक्र में आप प्यार, सम्बन्ध, सहानुभूति आदि में शामिल हो जाते हैं। इस चक्र में प्यार मौजूद होता है, इसलिए इसे स्वास्थ्य और इलाज के साथ जोड़ा जाता है। अनाहत चक्र छाती के बीच और हृदय से ऊपर स्थित है। अनाहत चक्र के सक्रीय हो जाने के बाद प्यार, आनंद और अंदर से एक शांति मिलती है। अनाहत चक्र स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त हृदय स्थल में द्वादश अक्षरों ‘ठ, ट, ञ, झ, ज, छ, च, ड़, घ, ग, ख और क’ से युक्त है। इस के अभीष्ट देवता श्री विष्णु जी हैं।
5. विशुद्ध चक्र : विशुद्ध चक्र का अर्थ है बहुत ही शुद्ध। इस चक्र के सक्रीय हो जाने के बाद आपका व्यवहार बदल जाता है। किसी को भी अपनी बातों और सच्चाई से मनाने की क्षमता इस चक्र में होती है। विशुद्ध चक्र गले में स्थित होता है। इस चक्र से आपके मन की घबराहट दूर होती है और आप लोगों के सामने अपनी बातों को सही तरीके से रख पाते हैं। यह षोडसदल कमल की पंखुड़ियों वाला, कण्ठ में स्थित चन्द्र वर्ण का षोडसाक्षर अः, अं, औ, ओ, ऐ, ए, ऊ, उ, लृ, ऋ, ई, इ, आ, अ वर्णों से युक्त है, यहाँ के अभीष्ट देवता शंकर जी हैं। कण्ठ में विशुद्ध चक्र सरस्वती का स्थान है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभतियाँ विद्यमान है।
6. आज्ञा चक्र : छठा चक्र है आज्ञा चक्र। जिसका अर्थ है बहुत ही ज्यादा बुद्धिमान। यह चक्र आपका मस्तिष्क खोलता है और आपकी सोच को भी अलग बनाता है। सहज ज्ञान या मानसिक ऊर्जा, अधिक संवेदनात्मक अनुभूति होना, ये सब आज्ञा चक्र से आता है। भू-मध्य स्थित लाल वर्ण दो अक्षरों हं, सः से युक्त दो पंखुड़ियों वाला यह चक्र ही आज्ञा-चक्र है। आज्ञा चक्र आंखों के बीच स्थित होता है। सहज ज्ञान, कल्पना, बुद्धि और कोई भी निर्णय लेने या सोचने की क्षमता इस चक्र से आपको प्राप्त होती है।
7. सहस्रार चक्र : सातवां चक्र है सहस्रार चक्र। यह चक्र मस्तिष्क के ऊपर स्थित होता है, जिसे ब्रह्म स्थान कहते है। इसका मूल मंत्र ‘ॐ’ है। सहस्रार चक्र में आप आत्मा से जुड़ पाते हैं, आपमें एक शुद्ध चेतना की ऊर्जा आती है। आप विशिष्ट ऊर्जा की तरफ बढ़ने लगते हैं, परमानंद मिलता है, शांति महसूस होती है। इस चक्र में अंदर और बाहर से सब चीज खूबसूरत लगती है, इसमें हमारा सम्पर्क आत्मा और परम सुख से होने लगता है। यह चक्र जागृत होते ही अनंत सिद्धियाँ मिलती है। व्यक्ति इतना सक्षम हो जाता है कि वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर सूक्षम रूप से जा सकता है। वह अपने इस शरीर से मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वह देव तुल्य हो जाता है।