चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा ‘नववर्ष प्रतिपदा’ कहलाती है। इस दिन से ही हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने मनु-शतरूपा के माध्यम से मानव सृष्टि का प्रारम्भ किया था। जिस प्रकार प्रत्येक माह के अलग नाम होते हैं, उसी तरह प्रत्येक वर्ष के नाम भी अलग होते हैं। वर्ष को संवत् कहा जाता है। भारत में दो प्रकार के संवत् प्रचलित हैं। उत्तर भारत में विक्रमादित्य द्वारा चलाया गया विक्रमी संवत् और दक्षिण भारत में कनिष्क राजा शालवाहन द्वारा चलाया गया शक संवत्। वैसे तो कालगणना पांच प्रकार से होती हैं- सौर चक्र, चन्द्र चक्र, नक्षत्र चक्र, सावन और अधिमास। वर्तमान में निम्न तीन ही अधिक प्रचलित हैं –

1. सौर वर्ष : यह वर्ष 365 दिनों का माना गया है। यह सूर्य की मेष संक्रान्ति से आरंभ होकर मीन संक्रांति तक चलता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, उस दिन उसी की संक्रांति होती है।

2. चन्द्र वर्ष : यह वर्ष 354 दिनों का होता है। यदि मास वृद्धि हो तो इसमें तेरह मास अन्यथा सामान्यतः 12 मास होते हैं। धर्म-कर्म, तीज-त्यौहार और लोक-व्यवहार में इस संवत्सर की ही मान्यता अधिक है।

3. सावन वर्ष : यह वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें 30 दिन का मास और दो मास की एक ऋतु होती है।

वर्तमान में प्रचलित सौरवर्ष पर आधारित अंग्रेजी कैलेंडर का प्रारम्भ ईसा के 4 या 5 वर्ष बाद हुआ था। इससे पूर्व चन्द्र चक्र पर आधारित यहूदी कैलेंडर ‘हिब्रू’ प्रचलित था। 16 जुलाई 622 को ईस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद मक्का छोड़कर मदीना गए थे। मुसलमान इसे हिजरत कहते हैं और यहीं से चन्द्र वर्ष पर आधारित हिजरी कैलेंडर का प्रारम्भ माना जाता है। भारत में हिजरी सन् का प्रारंभ मुगलकाल के दौरान हुआ, किंतु यह सर्वमान्य नहीं हो सका। ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य सिद्धान्त का गणितीय मान, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण की गणना और त्यौहारों की परिकल्पना विक्रमी संवत् से ही होता है, जिसमें एक दिन का भी अंतर नहीं होता।

संवत्सर का आरम्भ : मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने के लिए अनेक विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए, जिनमें क्रूर जाति के शक तथा हूण भी थे। हूण मध्य एशिया की एक खानाबदोश और बर्बर जाति थी। इन्होंने भारत के हिन्दू मन्दिरों, बुद्ध विहारों और जैन स्तूपों को भारी क्षति पहुंचाई और लूटमार की। भारत में इनका शासनकाल 130 ई.पू. से 388 ई. तक रहा। इनका साम्राज्य सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात, महाराष्ट्र, विदिशा और मथुरा तक फैला था। चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अनेक बार इनका सामना किया और भारत से इस कुल को समाप्त किया था। विक्रमादित्य का राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान, अरब और मिस्र तक फैला था। पहले इनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। शक विजय के बाद इन्होंने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक ‘सायर-उल-ओकुल’ में किया है।

चक्रवर्ती सम्राट उसे कहा जाता है जिसने समस्त भारतवर्ष पर शासन किया हो। राजा भरत पहले चक्रवर्ती सम्राट थे जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। विक्रम संवत् के अनुसार विक्रमादित्य 57 ईसा पूर्व हुए थे। इनका पूरा नाम विक्रम सेन था। इनके पिता गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिन्हें महेन्द्रादित्य, गर्दभिल्ल, गदर्भवेष भी कहते हैं। गंधर्वसेन की पांच पत्नियां थीं- मलयावती, मदनलेखा, पद्मिनी, चेल्ल और चिल्ल। इनके दो पुत्र भर्तृहरि और विक्रम सेन तथा दो पुत्रियां प्रियंगुमंजरी ;विद्योत्तमाद्ध और वसुंधरा थीं। गोपीचंद नामक उनका एक भान्जा था।

गोपीचन्द-भर्तृहरि का किस्सा हरियाणा में पं. लख्मीचन्द की रागनियों के माध्यम से गाया जाता है।

राजा भर्तृहरि द्वारा वैराग्य धारण करने पर 2078 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को विक्रम सेन ने राज्यभार संभाला। सम्राट विक्रमादित्य का वर्णन प्रसिद्ध लोककथा ‘वेताल पच्चीसी’ और ‘सिंहासन बत्तीसी’ में विस्तार से मिलता है। भविष्य पुराण और स्कन्द पुराण में भी विक्रमादित्य का विवरण उपलब्ध है।

विक्रमादित्य नाम विक्रम और आदित्य के समास से बना है, जिसका अर्थ है सूर्य के समान पराक्रमी व्यक्ति। विक्रम सेन बड़े पराक्रमी राजा थे। विक्रमादित्य की प्रसिद्धि के बाद भारत में महान् राजाओं को विक्रमादित्य की उपाधि दी जाने लगी, इनमें श्रीहर्ष, शूद्रक, हल, चन्द्रगुप्त द्वितीय, शिलादित्य, यशोवर्धन आदि प्रमुख हैं। विक्रमादित्य अपने राज्य में न्याय व्यवस्था सुचारू रखने के लिए समय-समय पर वेष बदलकर नगर में भ्रमण करते रहते थे। उनकी शासन कुशलता की अनेक गाथाएं इतिहास में मिलती हैं। सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों के नाम धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि थे। मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियां स्थापित हैं। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल तक विक्रमादित्य के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित रही।

चौथी शताब्दी में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375 ई. से 415 ई.) ने सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर (ईसा से 57 वर्ष पूर्व से) विक्रमी संवत् की शुरूआत की थी। इन्होंने भारत में शक शासकों को पराजित किया था। शालिवाहन या शक संवत् इससे 135 वर्ष बाद यानि सन् 78 ई. में आरंभ हुआ। कहते हैं कनिष्क शासक शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से शकों का मुकाबला किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक संवत् का प्रारम्भ हुआ। इस प्रकार विक्रम संवत् 2000 वर्ष पूर्व से प्रचलित है। विक्रम संवत् का निर्माण विक्रमादित्य के नौ रत्नों में से एक प्रसिद्ध खगोल शास्त्री वराहमीहिर ने किया था। इसमें दिन, सप्ताह और मास की गणना सूर्य व चंद्रमा की गति के आधार पर निश्चित की गई। बारह महीने का वर्ष एवं सात दिन के सप्ताह का प्रचलन विक्रम संवत् से ही आरंभ हुआ। यह कालगणना अंग्रेजी कैलेंडर से अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती है।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यता : हिंदू संस्कृति के अनुसार नव-संवत्सर पर कलश स्थापना कर नौ दिन का व्रत रखा जाता है। इस व्रत में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवमी के दिन हवन करके नौ कन्याओं के माध्यम से माँ भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। इसे सभी हिन्दू सात्विक भोजन, फलाहार युक्त व्रत-उपवास कर हर्षोल्लास से मनाते हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन से भारतवर्ष में कालगणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि –

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि। शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति।। – ब्रह्म पुराण

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा बसंत ऋतु में आती है। बसंत ऋतु में वृक्ष, लता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं इसलिए इसे मधुमास भी कहते हैं। आंध्रप्रदेश में युगदि या उगादि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है। सिंध प्रांत में इसको ‘चेटी चंडो’ (चैत्र का चांद) कहा जाता है, जिसे सिंधी हर्षोल्लास से मनाते हैं। कश्मीर में यह पर्व ‘नौरोज’ के नाम से मनाया जाता है, जिसका उल्लेख पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। सनातन धर्म के समस्त पर्व एवं संस्कार जैसे विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश, इत्यादि शुभ कार्य विक्रम संवत् के अनुसार होते हैं। इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है।

नव-संवत्सर का उत्सव : नव-संवत्सर का उत्सव हर वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को आरंभ होने वाला धार्मिक अनुष्ठान है। नौ दिनों तक निरंतर चलने वाला ‘नवरात्र’ पर्व इसी अनुष्ठान का हिस्सा है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि देश के गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती जैसे सभी राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय संवत् की तिथियों से नहीं, बल्कि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से मनाए जाते हैं। जबकि उसी विक्रम संवत्सर के आधार पर होली, दिवाली जैसे त्यौहारों पर अवकाश घोषित किया जाता है। हमें इस पर गम्भीरता से सोचना चाहिए।

कैसे करें नववर्ष का स्वागत : हिन्दू धर्म में रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। हिन्दू नववर्ष सूर्य की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होकर शंख तथा घंटे की मंगल ध्वनि के साथ, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण बनाएं। घर, कार्यालय व व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भगवा ध्वज व रंग-बिरंगी तोरण से सजाएं। कन्याओं को भोजन कराएं तथा समाज में पारस्परिक प्रेम तथा एकता के भाव उत्पन्न करते हुए स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, शैक्षणिक प्रतियोगिता, सांस्कृतिक प्रतियोगिता, खेलकूद प्रतियोगिता एवं रक्तदान शिविर का आयोजन करना जैसे विशेष समाज कल्याण के कार्य करें। नव-संवत्सर की प्रतिपदा जीवन में आत्म-गौरव भरने के लिए आती है। अतः सभी भारतीय इसे धूमधाम से मनाएं।