हिन्दू मान्यताओं में हनुमान को बल, बुद्धि, विद्या, शौर्य और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। संकटकाल में हनुमान जी का ही स्मरण किया जाता है, इसीलिए वह संकट मोचन कहलाते हैं। हनुमान के पिता सुमेरू पर्वत के राजा वानरराज केसरी और माता अंजनी थी। हनुमान को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारत में राजस्थान के सालासर (चुरू) व मेहंदीपुर (दौसा) में इनके विशाल एवं भव्य मन्दिर है। दक्षिण भारत में इन्हें वेंकटेश्वर और तिरूपति के नाम से पूजा जाता है। लोकप्रिय महाकाव्य रामायण के प्रमुख पात्र हनुमान का अवतार त्रेतायुग के अन्त में भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। इन्होंने किस प्रकार पहले राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से राक्षसों का मर्दन किया, वह जगत प्रसिद्ध है। हनुमान जी का जन्म त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमान जी बहुत ही जल्द प्रसन्न होने वाले देवता हैं। उनकी कृपा आप पर निरंतर बनी रहे इसके लिए पहली शर्त यह है कि आप मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें अर्थात् कभी भी झूठ न बोलें, किसी भी प्रकार का नशा न करें, मांस न खाएं और परिवार के सदस्यों से प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रखें। विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें। मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं।

हनुमान जी का बालपन :

हनुमान का बचपन का नाम मारूति था। वह बचपन में बहुत बुद्धिमान थे। इन्होंने उड़ने की कला पवनदेव से बचपन में ही सीख ली थी। एक दिन माता अंजनी फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब हनुमान को भूख लगी तो वह उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने लगे। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। राहु को देखकर वह सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहू ने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि दूसरा कोई राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है। राहु की शिकायत पर इन्द्र ने बालक मारूति पर अपने वज्र से प्रहार किया, जिससे उनकी टुड्डी टूट गई। इस पर पवनदेव ने क्रोधित होकर अपनी गति को रोक लिया, जिससे संसार का कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये।

ब्रह्मा जी उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वह मूर्छित हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा ने उन्हें स्वस्थ किया, तब वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की। ब्रह्मा ने आशीर्वाद दिया कि संसार का कोई भी अस्त्र या शस्त्र इसके शरीर को हानि नहीं पहुंचा सकेगा। इन्द्र के वज्र से हनुमान की ठुड्डी (संस्कृत में हनु) टूट गई थी, इसलिये उनको हनुमान का नाम दिया गया। इसके अलावा इनके अनेक नाम से प्रसिद्ध हैं, जैसे- बजरंग बली, मारुति, अंजनि सुत, पवनपुत्र, संकटमोचन, केसरीनन्दन, महावीर, कपीश, शंकर सुवन आदि।

ब्रह्मांड पुराण के अनुसार भगवान हनुमान के पांच सगे छोटे भाई थे, जिनके नाम मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान हैं। मतिमान अपनी बुद्धि और ज्ञान के लिए जाने जाते थे। श्रुतिमान वेदों, ज्योतिष और खगोल विद्या के पूर्ण ज्ञाता थे। केतुमान एक महान और पराक्रमी योद्धा थे। गतिमान तीव्र गति से चलने और छलांग लगाने में निपुण थे। धृतिमान सबसे छोटे भाई जो धैर्य और साहस के प्रतीक थे। इन सभी भाइयों में हनुमान जी सबसे बड़े थे। देवताओं की कृपया से हनुमान जी में ये सभी गुण जन्मजात उपलब्ध थे।

हनुमान जी को श्राप :

हनुमान जी बचपन में बहुत शरारती थे। पवन देव की कृपा से यह आकाश में उड़ना जानते थे। यदा-कदा ऋषि मुनियों को तंग किया करते थे। तब एक ऋषि ने इन्हें उड़ने की कला भूलने का श्राप दिया और कहा कि जब कोई तुम्हें इस विद्या का ज्ञान करवाएगा तब यह तुम्हें अपने आप याद आ जाएगी। हनुमान को सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त था। हनुमान जी सेवक, राजदूत, नीतिज्ञ, विद्वान, रक्षक, वक्ता, गायक, नर्तक, बलवान और बुद्धिमान भी थे। शास्त्रीय संगीत के तीन आचार्यों में से एक हनुमान थे। अन्य दो थे, शार्दूल और कहाल। ‘संगीत पारिजात’ हनुमान के संगीत सिद्धान्त पर आधारित है।

माता अंजनी को श्राप :

हनुमान की माता अपने पूर्व जन्म में देवराज इन्द्र की सभा में पुंजिकस्थली नामक एक अप्सरा थीं। एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रही थीं। इससे क्रोधित होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वानरी हो जाने का शाप दे दिया। क्षमा प्रार्थना करने पर दुर्वासा ने उसे अपनी इच्छा से रूप बदलकर रहने का आशीर्वाद दिया। पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया। उनका नाम अंजनी रखा गया। विवाह योग्य होने पर पिता ने अपनी सुंदर पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया। एक बार घूमते हुए वानरराज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुंचे। उन्होंने देखा कि कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे। उसी समय वहां एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया। ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, वह दुष्ट हाथी उनकी ओर झपटा। पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को उत्पात मचाते देखा तो उन्होंने उसे मार डाला। प्रसन्न होकर ऋर्षियों ने कहा, ‘वर मांगो वानरराज।’ केसरी ने वरदान मांगा कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान तेजस्वी पुत्र आप मुझे प्रदान करें। ऋषियों ने तथास्तु कहा और वो चले गए।

होई है वही जो राम रची राखा। को करी तर्क बढ़ावहि शाखा।।

एक दिन माता अंजनी, मानव रूप धारण कर पर्वत के शिखर पर जा रही थी। वह डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को निहार रही थीं। तभी अचानक पवन देव प्रकट हो गए और बोले, देवी! आपके पति को ऋषियों ने मेरे समान पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया है। उन्हीं महात्माओं के वचनों से मेरे अंश से आपको एक महातेजस्वी बालक प्राप्त होगा। उन्होंने बताया कि भगवान रुद्र आपके पुत्र रूप में प्रकट होंगे। इस तरह श्रीरामदूत हनुमानजी ने वानरराज केसरी के यहां जन्म लिया। यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगेगी। कलियुग में हनुमान ने अपने भक्तों को उनके होने का आभास कराया है। यह वचन हनुमान ने ही तुलसीदास से कहे थे –

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।

लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर श्रीराम उन्हें युद्ध में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञता स्वरूप उपहार देते हैं। इसी अवसर पर हनुमान ने सीना चीरकर दिखाया था और श्रीराम हनुमान को आशीर्वाद देते हैं कि जब तक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। हनुमान कलियुग के अंत तक धरती पर रहेंगे। हनुमान इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमान की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम है। कलयुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमान की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं। हनुमान अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है। कलयुग में धर्म की रक्षा का कार्य 4 लोगों के हाथों में है- दुर्गा, भैरव, हनुमान और कृष्ण।

हनुमान जी का विवाह :

क्या अपने कभी सुना है कि हनुमानजी का विवाह भी हुआ था? आज तक यह बात लोगों से छिपी रही, क्योंकि लोग शास्त्र नहीं पढ़ते और जो पंडित या आचार्य शास्त्र पढ़ते हैं वह ऐसी बातों का जिक्र नहीं करते हैं। इस संबंध में एक कथा है कि हनुमान ने भगवान सूर्यदेव को अपना गुरु बनाया था। भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देते। लेकिन उनको ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया। कुल 9 तरह की विद्याओं में से सूर्यदेव ने हनुमान को 5 तरह की विद्याएं तो सिखा दीं, लेकिन बची 4 तरह की विद्याएं और ज्ञान ऐसे थे, जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे। ऐसी स्थिति में सूर्यदेव ने हनुमान को विवाह की सलाह दी। सूर्यदेव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमान के साथ विवाह के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद हनुमान ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गईं। इस तरह हनुमान भले ही विवाह के बंधन में बंध गए हो, लेकिन शारीरिक रूप से वह आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं।

पंचमुखी रूप धारण करना :

जब राम के साथ युद्ध में रावण को अपनी हार का आभास हुआ तो उसने अपने भाई अहिरावण से मदद मांगी। अहिरावण ताड़का के मायावी पुत्र मारिच का पुत्र था। अहिरावण ने माया से श्रीराम की पूरी सेना को सुला दिया और राम-लक्ष्मण को बंधक बनाकर पाताल लोक में ले गया। जब सभी को होश आया तो विभीषण रावण की इस चाल को समझ गए और उन्होंने हनुमान जी को पाताल लोक जाने को कहा। हनुमान जी श्रीराम और लक्ष्मण की तलाश में पाताल लोक जा पहुंचे। वहां उन्होंने सबसे पहले मकरध्वज को हराया और फिर अहिरावण से भिड़ने जा पहुंचे। लेकिन वहां अहिरावण ने 5 दिशाओं में 5 दीपक जला रखे थे और उसे वरदान था कि जो भी यह 5 दीपक एक साथ बुझा देगा, वही उसका वध कर पाएगा। ऐसी परिस्थिति देख हनुमान ने पंचमुखी रूप धारण किया और पांचों दीये बुझाकर अहिरावण का वध किया था। पंचमुखी हनुमान की पूजा का अत्यंत लाभ मिलता है। इनके पांच मुखों में उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख और पूर्व दिशा में हनुमान मुख है। मान्यता है कि घर में पंचमुखी हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर लगाकर पूजा की जाए तो मंगल, शनि, पितृ व भूत दोष से मुक्ति मिल जाती है। इसकी पूजा से जीवन में आने वाले हर तरह के संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि यह प्रतिमा या तस्वीर दक्षिण दिशा में ही लगानी चाहिए।

हनुमान जी का जन्म स्थान :

पहला स्थान : पंपासरोवर अथवा पंपासर होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। इसके निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करके अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। यहां स्थित एक पर्वत में एक गुफा भी है जिसे रामभक्तनी शबरी के नाम पर शबरी गुफा कहते हैं। इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध मतंगवन था। हंपी में ऋष्यमूक पर राम मन्दिर के पास स्थित पहाड़ी आज भी मतंग पर्वत के नाम से जानी जाती है। कहते हैं कि मतंग ऋषि के आश्रम में ही हनुमानजी का जन्म हआ था। मतंग नाम की आदिवासी जाति से हनुमानजी का गहरा संबंध रहा है। यह जन्म स्थान ही अधिक तर्कसंगत एवं तथ्ययुक्त है।

दूसरा स्थान : हनुमानजी की माता का नाम अंजना है, जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। हनुमानजी के पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। माता-पिता के कारण हनुमानजी को आंजनेय और केसरीनंदन कहा जाता है। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वह वानरों की कपि नाम की जाति से थे। केसरीजी कपि क्षेत्र के राजा थे। कपिस्थल कुरु साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। हरियाणा का कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। यह कैथल ही पहले कपिस्थल था। कुछ लोग मानते हैं कि यही हनुमानजी का जन्म स्थान है।

तीसरा स्थान : गुजरात के डांग जिले के आदिवासियों की मान्यता अनुसार डांग जिले के अंजना पर्वत में स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजी का जन्म हुआ था।

चौथा स्थान : कुछ लोग मानते हैं कि हनुमानजी का जन्म झारखंड राज्य के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र गुमला जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर आंजन गांव की एक गुफा में हुआ था।