मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम
शिव, राम, कृष्ण, हनुमान, महावीर, बुद्ध और नानक के बिना भारत उस शरीर की तरह है जिसमें कोई आत्मा नहीं। सिर्फ एक राम को अलग करने से ही भारत का संपूर्ण धर्म और संस्कृति मरुस्थल की तरह हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि राम तो एक राजा थे, जिसने अपनी पत्नी की रक्षा करने के लिए रावण जैसे राक्षसों का वध किया था। कुछ का मानना है कि वह एक काल्पनिक पात्र हैं। तर्क से सही को गलत और गलत को सही सिद्ध किया जा सकता है। यह सभी तर्कबाज नफरत के रावण हैं।
राम शब्द सुनने में जितना सुंदर लगता है उससे कहीं महत्त्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है और हमें आत्मिक आनन्द और शांति की प्राप्ति होती है। राम राम जपते हुए असंख्य साधु-संत मुक्ति को प्राप्त हुए हैं। निरन्तर राम नाम का जाप करते रहने से प्रभु श्रीराम रोम-रोम में बस जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि रामकथा के प्रथम रचनाकार वाल्मीकि तो उल्टा राम अर्थात् ‘मरा-मरा’ जपकर डाकू रत्नाकर से संत वाल्मीकि बने थे।
भगवान राम के जन्म, बालपन, सीता-स्वयंवर, वनवास, सीताहरण, समुद्र सेतु निर्माण तथा परिवार सहित रावण के अंत का वर्णन हमें ‘वाल्मीकी रामायण’ और तुलसीदास द्वारा लिखी ‘राम चरित मानस’ से प्राप्त होता है। पहले रामायण में 6 अध्याय थे, उसमें उत्तरकांड नहीं था। तुलसीदास ने बाद में लव कुश कांड नामक सातवां अध्याय लिखा तथा राम के चरित्र को और विस्तार दिया। भगवान राम हिन्दू धर्म का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। हिन्दू धर्म-विरोधी आलोचक श्रीराम की आलोचना जरूर करते हैं। उन्हें मालूम है कि यदि इस स्तंभ को गिरा दिया गया तो हिन्दुओं का धर्मांतरण करना और आसान हो जाएगा।
भगवान श्रीराम की कथा सर्वप्रथम भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। शिवजी के मुख से निकली पवित्र राम कथा ‘अध्यात्म रामायण’ के नाम से विख्यात है। लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। बाद में लोमश ऋषि ने शाप से मुक्त होने के लिए उन्हें राम नाम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। नागपाश में बंधने पर राम के विषय में सन्देह होने पर काकभुशुण्डि ने रामायण गिद्धराज गरुड़ को सुनाई थी।
भगवान राम ने अपना पूरा जीवन आदर्श और मर्यादा की रक्षा में व्यतीत किया तथा जनमानस को जीवन जीने का उचित मार्ग दिखाया। धर्म के चार चरण सत्य, तप, पवित्रता और दान माने गए हैं। जब त्रेतायुग में सत्य का लोप होता है तब उसके साथ ही आदर्श और मर्यादा का भी लोप हो जाता है और धरती पर पाप बढ़ जाता है। इस कारण ताड़का, मारिच, खर-दूषण, रावण, कुम्भकरण, मेघनाद जैसे अधर्मी, दुराचारी राक्षस उत्पन्न होते हैं। अतः धर्म की रक्षा हेतू समाज में आदर्श और मर्यादा स्थापित करने के लिए भगवान विष्णु ने ‘राम’ के रूप में धरती पर अवतार लिया था। धर्म की मर्यादा में रहकर आदर्शों का पालन करते हुए कर्तव्य निभाने के कारण ही समाज में दशरथ पुत्र राम को ‘भगवान राम’ का दर्जा मिला।
भगवान राम ने ही सर्वप्रथम भारत की सभी पिछड़ी जातियों और जनजातियों को एक सूत्र में बांधने का कार्य दंडकारण्य में अपने 14 वर्ष के वनवान के दौरान किया था। दंडकारण्य वन क्षेत्र में वर्तमान भारत के छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी. तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किमी. है। इसी दंडकारण्य क्षेत्र में रहकर राम ने अखण्ड भारत के सभी दलितों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान दिया। वाल्मीकि रामायण में श्रीराम द्वारा लंका जाने के लिए आधुनिक माप से 48 किमी. लम्बे और 3 किमी. चौड़े पत्थर के सेतु का निर्माण करने का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसको रामसेतु कहते हैं। यह आज भी विद्यमान है। भगवान श्रीराम ने अपनी वनवास यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया जा चुका है। जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे, वहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं।
भगवान श्रीराम का अस्तित्त्व :
श्रीराम का जन्म शृंगी ऋषि के आशीर्वाद से देवी कौशल्या के गर्भ से अयोध्या में हुआ था। श्रीराम जी चारों भाइयों में सबसे बड़े थे। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम जयंती या राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है।
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञचसु।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सः।।
अर्थात् श्री राम का जन्म चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों (सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र, शनि) के अपने उच्च स्थान में तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर हुआ।
हिन्दू धर्म ग्रन्थों में, विशेषतः पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं, जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष तथा द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेतायुग के अन्त में अर्थात् द्वापर युग से पहले हुआ था। चूंकि कलियुग का अभी (लगभग 3100 ई.पू.) प्रारंभ ही हुआ है और राम का जन्म त्रेतायुग के अंत में हुआ। अवतार लेकर धरती पर उनके रहने का समय परंपरागत रूप से 11,000 वर्ष माना गया है। इस प्रकार द्वापर युग के 8,64,000 वर्ष, राम के जीवन के 11,000 वर्ष, द्वापर युग के अंत से अब तक बीते 5,120 वर्ष मिलाकर कुल 8,80,120 वर्ष होते हैं। अतः राम का जन्म आज (2020 ई.) से लगभग 8,80,120 वर्ष पहले माना जाता है।
वाल्मीकी रामायण में विन्ध्याचल तथा हिमालय की ऊंचाई समान बताई गई है। वर्तमान में विन्ध्याचल की ऊंचाई (अमरकंटक, मध्यप्रदेश) लगभग 3439 फीट (1058 मीटर) है तथा यह प्रायः स्थिर है, जबकि हिमालय की ऊंचाई (माउंट एवरेस्ट, नेपाल) लगभग 28756 फीट (8848 मीटर) है तथा यह निरंतर वर्धनशील है। दोनों की ऊंचाई का अंतर 25317 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार हिमालय 100 वर्षों में लगभग 3 फीट बढ़ता है। अतः 25317 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,40,000 वर्ष लगे होंगे। अतः आज (सन् 2020) से 8,40,000 वर्ष पहले हिमालय की ऊंचाई विन्ध्याचल के समान रही होगी, जिसका उल्लेख वाल्मीकी रामायण के वर्तमान स्वरूप में हुआ है। वर्तमान में विंध्याचल और हिमालय की कई पर्वत श्रेणियां विद्यमान हैं, जिससे वास्तविक पर्वत का निश्चय करना असम्भव है। यहां वर्तमान में सबसे ऊंची चोटी के मान लिए गए हैं।
भगवान श्रीराम का परिवार :
अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियां थीं – कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी। श्रीराम के तीन भाई थे – लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। श्रीराम कौशल्या के पुत्र थे। सुमित्रा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो पुत्र थे। कैकयी के पुत्र का नाम भरत था। राम की पत्नी का नाम सीता, लक्ष्मण की पत्नी का नाम उर्मिला, शत्रुघ्न की पत्नी का नाम श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी का नाम मांडवी था। सीता और उर्मिला राजा जनक की पुत्रियां थीं और मांडवी और श्रुतकीर्ति जनक के भाई कुशध्वज की पुत्रियां थीं। लक्ष्मण के अंगद तथा चंद्रकेतु नामक तथा श्रीराम के पुत्रों लव और कुश सहित चारों भाईयों के 2-2 पुत्र थे।
भगवान श्रीराम की बहन :
दक्षिण भारतीय कम्बन रामायण के अनुसार श्रीराम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाईयों से बड़ी थीं। शांता, राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थी। जन्म के कुछ समय बाद राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था। भगवान श्रीराम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात् श्रीराम की मौसी थी।
भगवान राम के पूर्वज :
भगवान श्रीराम हिंदूओं के आराध्य देवता हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म त्रेयायुग में अयोध्या के सूर्य वंश में हुआ था। भगवान राम विष्णु के 7वें अवतार माने जाते हैं। ब्रह्माजी से लेकर श्रीराम की वंश परंपरा में ब्रह्माजी से मरीचि और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। इसके बाद कश्यप और अदिति के पुत्र विवस्वान हुए। जब विवस्वान हुए तभी से सूर्यवंश का आरंभ माना जाता है। विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र हुए- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाभ (नाभाग), अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। भगवान राम का जन्म वैवस्वत मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। सूर्य वंशी भगवान श्रीराम का जन्म कश्यप-अदिति पुत्र विवस्वान (सूर्य) के वंश में ब्रह्मा की 67वीं पीढ़ी में हुआ था। आपको बता दें कि जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल में पैदा हुए थे।
इक्ष्वाकु से सूर्यवंश में वृद्धि होती चली गई। इक्ष्वाकु वंश में कई पुत्रों का जन्म हुआ जिनमें विकुक्षि, निमि और दण्डक शामिल हैं। समय के साथ इसी वंश में युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, आगे चलकर दिलीप से प्रतापी पुत्र भगीरथ हुए। धीरे-धीरे यह वंश परंपरा आगे की तरफ बढ़ती चली गई जिसमें हरिश्चन्द्र, रोहित, वृष, बाहु और सगर भी पैदा हुए। रघु के प्रताप से इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा, क्योंकि रघु बहुत ही पराक्रमी और ओजस्वी नरेश थे। तभी कहा गया है ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।’ रघु के पुत्र प्रवृद्ध से आगे कई वंश चले, जिसमें नाभाग हुए, फिर नाभाग के पुत्र अज हुए। अज से दशरथ हुए और दशरथ अयोध्या के राजा बने। राजा दशरथ की तीन पत्नियां थीं – कौशल्या, केकैयी और सुमित्रा। दशरथ के राम, भरत, लक्ष्मण और शुत्रुघ्न आदि चार पुत्र हुए। वाल्मीकि रामायण में राम के कुल का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है।
भगवान राम का बैकुंठ प्रस्थान :
भगवान श्रीराम हिन्दुओं के अत्यंत पूजनीय हैं और आदर्श देवता हैं। श्रीराम विश्व के कई देशों जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि में भी आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। राम की कहानी की रचना रामायण महाकाव्य के रूप में ई.पू. 7वीं से चौथी शताब्दी के बीच की है। तुलसीदास द्वारा ‘राम चरित मानस’ की रचना के बाद इसका और अधिक प्रचार प्रसार हुआ।
श्रीराम के अवश्मेघ यज्ञ के बाद सीता जी अपने दोनों बच्चों लव और कुश को प्रभु श्रीराम को सौंप दिया और धरती माता के साथ जमीन में समा गईं थी। इसके बाद एक बार हनुमान के अयोध्या में नहीं रहने पर यमराज भेष बदलकर अयोध्या आए। उन्होंने श्रीराम से अकेले में बात करने की बात कही। श्रीराम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि कोई भी उन्हें परेशान ना करे। संयोग से उसी समय दुर्वासा ऋषि के आगमन से लक्ष्मण को उन्हें बीच में टोकना पड़ा। इसलिए सजा के तौर पर भगवान राम ने लक्ष्मण को देश निकाला दे दिया। भाई से दूर होकर लक्ष्मण ने सरयू नदी में समाधि ले ली और अपने शेषनाग के रूप में आ गए। भाई की जलसमाधि से आहत श्रीराम ने भी सरयू नदी में जल समाधि ले ली और अपना वास्तविक विष्णु रूप ले लिया। इस प्रकार श्रीराम ने मानव शरीर त्याग दिया और बैकुंठ चले गए।