दस महाविद्या क्या है ?
हिंदू धर्म में कोई भी उपासक अपनी रुचि के अनुसार देवी-देवता की पूजा के लिये स्वतंत्र है। शास्त्रों में इस बात की व्यवस्था की गई कि कार्य और उद्देश्य के अनुसार किसी भी देवी-देवता की उपासना की जा सकती है। इस प्रकार समान्य गृहस्थों के लिये सभी देवता पूजनीय हैं। हिन्दू धर्म में देवताओं की तरह देवियों की भी संख्या असंख्य है। प्रायः सभी देवताओं की शक्तियाँ उनकी पत्नियों के रूप में प्रसिद्ध हैं। कुछ देवियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता भी है और उनके आधार पर सम्प्रदाय भी संचालित हुए। वैष्णवों में लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा अधिक प्रचलित हैं। शिव की पत्नी गौरी मूर्तिशास्त्र में अनेक नाम और आयुधों से जानी जाती हैं।
आदिशक्ति ही प्रत्यक्ष और अदृश्य रूप से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का आधार है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव की उत्पत्ति इन्हीं की इच्छानुसार हुई हैं। इस शक्ति द्वारा ही तीनों देव तीन प्राकृतिक गुण सत्व गुण, रजो गुण तथा तमो गुण के कारक बने है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन इन्हीं गुणों के द्वारा ही होता हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान शिव ने तंत्र साधना की उत्पत्ति की, जिनके साथ उनकी अर्धांगिनी पार्वती की तामसी शक्ति महाकाली रही जो समय-समय पर भयंकर रूप धारण करती हैं। यह देवी सौम्य, सौम्य-उग्र तथा उग्र तीन स्वरूपों में हैं, जिनके स्वभाव के अनुसार ‘श्री कुल’ और ‘काली कुल’ में विभाजित हैं। यह देवी अपने कार्य तथा गुण के अनुसार अनेकों अवतारों में प्रकट हुई, जो गुण एवं स्वभाव से भिन्न-भिन्न हैं।
काली कुल की देवियाँ प्रायः घोर भयानक स्वरूप तथा उग्र स्वभाव वाली होती हैं तथा इनका सम्बन्ध काले या गहरे रंग से होता हैं, इसके विपरीत श्री कुल की देवियाँ सौम्य तथा कोमल स्वभाव की होती है। काली कुल में महाकाली, तारा, बगलामुखी, धूमावती, छिन्नमस्ता आती हैं जिनका स्वभाव उग्र माना जाता हैं। जो दुष्टों के लिये ही भयानक रूप धारण करती हैं और श्री कुल में भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी, कमला, त्रिपुर भैरवी और मातंगी आती हैं, जो अपने स्वभाव में सौम्य मानी जाती हैं। भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं, जो भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियों तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं।
दस महाविद्याओं के नाम :
1. महाकाली 2. तारा 3. षोड़सी 4. भुवनेश्वरी 5. छिन्नमस्ता
6. त्रिपुर भैरवी 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला
1. महाकाली : संसार की आदिशक्ति स्वरूप महाकाली महाविद्या अपने साधक को अभय प्रदान करती है। उसका जीवन भय व रोग मुक्त बना रहता है तथा शत्रु भी सामने टिक नही पाते। इनकी इच्छा शक्ति ने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत को उत्पन्न किया है। समस्त शक्तियां प्रत्यक्ष तथा अदृश्य रूप से इनका स्वरूप मानी गई हैं। प्रलयकाल में महाकाली स्वयं मृत्यु के देवता महाकाल को भी भक्षण करने में समर्थ हैं। महाकाली अपने भैरव महाकाल की छाती पर भयंकर मुद्रा में खड़ी हैं। यह असुरों के कटे हुए मस्तकों की माला धारण करती हैं। इनका स्वरूप अत्यंत विकराल हैं, मुंह से निकली हुई जिह्वा को अपने भयानक दांतों से दबाये हुए हैं और स्वामी की छाती पर नग्न अवस्था में खड़ी हैं। यह देवी दैत्यों के कटे हुए हाथों की करधनी धारण करती हैं। देवी ने ऐसा भयंकर रूप रक्तबीज के वध के लिए धारण किया था। दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ महाकाली साधना मानी गयी, जो कल्पवृक्ष के समान शीघ्र फलदायी एवं साधक की समस्त कामनाओं की पूर्ति में सहायक हैं।
2. तारा : दस महाविद्याओं में तारा सम्पूर्ण ब्रह्मांड में उत्कृष्ट तथा सर्वज्ञान से सम्बन्ध रखती हैं और अपने भक्त को दरिद्रता, शत्रु, अज्ञान, तन्त्र बाधा, भय जैसे घोर संकट से मुक्त करने वाली मानी गई है। इस महाविद्या की साधना करने वाला साधक जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। जब महाकाली देवी ने हयग्रीव नामक दैत्य का वध करने के लिए नीले रंग का शरीर धारण किया तो वह देवी का उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। तारा देवी भगवान राम की वह विध्वंसक शक्ति हैं, जिन्होंने रावण का वध किया था। इस देवी के भैरव शिव माने गये है। देवी की आराधना, साधना मोक्ष प्राप्त करने हेतु, तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं। देवी ज्वलंत चिता में रखे हुए शव के ऊपर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये नग्न अवस्था में खड़ी हैं
3. त्रिपुर सुंदरी (षोडशी) : तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर एक सोलह वर्षीय चिरयौवन युवती जिसको षोडशी या त्रिपुर सुंदरी के नाम से जाना जाता है। यह दस महाविद्याओं में अपना तीसरा स्थान रखती है। अपने नाम के अनुसार देवी तीनों लोकों में सर्वाधिक सुंदर हैं। इनका रूप तथा यौवन तीनों लोकों में सभी को मोहित करने वाला हैं। देवी सोलह कलाओं से पूर्ण और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं। कामाख्या पीठ महाविद्या त्रिपुरसुन्दरी से ही सम्बंधित तंत्र पीठ माना जाता हैं, जहाँ सती की योनि गिरी थीं। यहाँ स्त्री योनि के रूप में देवी की पूजा आराधना होती हैं। यह महाविद्या शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव की नाभि से निकलकर कमल-आसन पर बैठी हुई हैं। इनकी चार भुजाएं हैं तथा अपनी चार भुजाओं में देवी पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करती हैं। समस्त प्रकार की दिव्य, अलौकिक तंत्र तथा मंत्र शक्तियों की देवी अधिष्ठात्री मानी गयी हैं। तंत्र में उल्लेखित मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तम्भन आदि कर्म इनकी कृपा के बिना पूर्ण नहीं होते हैं। अपने भक्तों को हर प्रकार की शक्ति देने में यह महाविद्या समर्थ हैं।
4. भुवनेश्वरी : यह तीनों लोकों स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी, की महारानी पद पर स्थित है। यह चैथी महाविद्या भुवनेश्वरी नाम से विख्यात हैं। सम्पूर्ण जगत के पालन-पोषण का दायित्व इन्हीं भुवनेश्वरी देवी का हैं। कारणवश देवी जगतमाता तथा जगतधात्री नाम से भी विख्यात हैं। पंच तत्व आकाश, वायु, पृथ्वी, अग्नि, जल जिनसे चराचर जगत के प्रत्येक जीवित तथा अजीवित तत्व का निर्माण होता हैं, वह सब इन्हीं देवी की शक्तियों द्वारा संचालित होते हैं। भगवान शिव का वाम भाग देवी भुवनेश्वरी के रूप में जाना जाता है। सदाशिव को सर्वेश्वर होने की योग्यता इन्हीं के संग होने से प्राप्त हैं। इनकी भुजा में सुशोभित अंकुश नियंत्रक का प्रतीक हैं। देवी के मस्तक पर अर्ध चन्द्र सुशोभित हैं एवं तीन नेत्र हैं तथा मुखमंडल मंद-मंद मुस्कान की छटा युक्त हैं। ‘दुर्गम’ नामक दैत्य के अत्याचारों से त्रस्त हो समस्त देवता तथा ब्राह्मणों ने हिमालय पर जाकर इन्हीं भुवनेश्वरी देवी की स्तुति की थीं। सताक्षी रूप में इन्होंने ही पृथ्वी के समस्त नदियों-जलाशयों को अपने अश्रु जल से भर दिया था। शाकम्भरी रूप में देवी ही अपने हाथों में नाना शाक-मूल इत्यादि खाद्य द्रव्य धारण कर प्रकट हुई तथा सभी जीवों को भोजन प्रदान किया। अंत में देवी ने दुर्गमासुर दैत्य का वध कर, तीनों लोकों को उसके अत्याचार से मुक्त किया तथा दुर्गा नाम से प्रसिद्ध हुई।
5. छिन्नमस्ता : तन्त्र की महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर अवस्थित महाविद्या छिन्नमस्ता हैं जो अनावश्यक तथा अत्यधिक वासना, मनोरथों के बलिदान की प्रतीक मानी जाती है। इनकी साधना से सभी प्रकार के शत्रु नष्ट हो जाते है और जातक को असुरी शक्तियों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जिनका मस्तक देह से अलग हैं वह छिन्नमस्ता कहलाती हैं। देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काटकर, अपने अन्य हाथ में धारण किए हुए हैं। देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप अन्य समस्त देवी-देवताओं से भिन्न हैं। देवी जीवन के परम सत्य मृत्यु को दर्शाती हैं, वासना से नूतन जीवन की उत्पत्ति तथा अंततः मृत्यु की प्रतीक स्वरूप हैं। महाविद्या छिन्नमस्ता योग अभ्यास के पर्यन्त इच्छाओं के नियंत्रण और यौन वासना के दमन का प्रतिनिधित्व करती हैं। छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत ही गोपनीय हैं, जिसे कोई सिद्ध पुरुष ही जान सकता हैं। देवी के कटे हुए गले से रक्त की तीन धार निर्गत हो रही हैं, जिनमें से देवी एक धार से स्वयं रक्तपान कर रहीं हैं तथा अन्य दो धाराएँ इन्होंने अपनी सखी सहचरियों को पान कराने हेतु प्रदान कर रखी हैं। इनके साथ इनकी दो सखी सहचरी डाकिनी तथा वारिणी हैं, जिनके क्षुधा निवारण हेतु ही देवी ने अपने ही खड्ग से स्वयं अपने मस्तक को अलग कर दिया। देवी कामदेव तथा रति के ऊपर विराजमान हैं। देवी के आभूषण सर्प हैं, देवी तीन नेत्रों से युक्त तथा मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती हैं तथा इन्होंने नर मुंडो की माला धारण कर रखी हैं।
6. त्रिपुर भैरवी : महाविद्याओं में छठी महाविद्या त्रिपुर भैरवी नाम से विख्यात हैं। देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र, भयंकर तथा डरावना हैं जो विध्वंस की पूर्ण शक्ति मानी जाती हैं। यह महाविद्या त्रिपुर भैरवी भगवान शिव के विध्वंसक स्वरुप का प्रतीक है। त्रिपुर शब्द का अर्थ हैं, तीनों लोक स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तथा भैरवी शब्द विनाश के एक सिद्धान्त के रूप में अवस्थित हैं। तात्पर्य हैं तीन लोकों में नष्ट या विध्वंस की जो शक्ति हैं, वही त्रिपुर भैरवी हैं। देवी तामसी गुण सम्पन्न हैं, देवी कालरात्रि या काली के समान हैं। भैरवी देवी की साधना मुख्यतः घोर कर्मों में होती हैं, देवी ने ही उत्तम मधुपान कर महिषासुर का वध किया था। चार भुजाओं से युक्त देवी भैरवी अपने बाएं हाथों से वर तथा अभय मुद्रा प्रदर्शित करती हैं और दाहिने हाथों में मानव खप्पर तथा खड्ग धारण करती हैं। देवी रुद्राक्ष तथा सर्पों के आभूषण धारण करती हैं, मानव खप्परों की माला देवी अपने गले में धारण करती हैं। दस महाविद्याओं में त्रिपुर भैरवी की साधना कल्पवृक्ष के समान शीघ्र फलदायी मानी गयी हैं।
7. धूमावती : दस महाविद्याओं में सातवें स्थान में अवस्थित महाविद्या धूमावती, जो विधवा, कुरूप तथा अपवित्र देवी है जिनका स्वरूप अत्यंत ही क्रोधित है। जिनकी साधना तंत्र बाधा, शत्रु को जड़ से नष्ट करने, बर्बाद करने के लिए की जाती है। वह देवी धूमावती महाविद्या कही गयी है। महाविद्या धूमावती अकेली स्वयं नियंत्रक हैं। इनकी अपने स्वामी में कोई रूचि नहीं हैं, यह देवी भगवान शिव की विधवा मानी जाती हैं। महाप्रलय के पश्चात केवल मात्र देवी की शक्ति ही चारों ओर विद्यमान रहती हैं। देवी का स्वरूप धुएं के समान हैं। देवी दरिद्रों के घर में दरिद्रता के रूप में विद्यमान रहती हैं, जो अलक्ष्मी नाम से विख्यात हैं। अलक्ष्मी, देवी लक्ष्मी की बहन हैं परन्तु गुण तथा स्वभाव से पूर्णतः विपरीत हैं। धूमावती का स्वरूप अत्यंत ही कुरूप हैं, भद्दे एवं विकट दन्त पंक्ति हैं, एक वृद्ध महिला के समान देवी दिखाई देती हैं। विधवा होने के कारण देवी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। धूमावती देवी रुद्राक्ष की माला आभूषण रूप में धारण करती हैं, इनके हाथों में एक सूप हैं, माना जाता हैं देवी जिस पर कुपित होती हैं, उसके समस्त सुख इत्यादि अपने सूप पर ही ले जाती हैं।
8. बगलामुखी : तंत्र की उत्कृष्ट महाविद्या बगलामुखी के नाम से अच्छे से अच्छे तांत्रिक कांपने लगते है जो ब्रह्मास्त्र का रूप मानी जाती है। वह उच्चकोटि की महाविद्या बगलामुखी, दस महाविद्या में आठवें स्थान पर विराजमान है। जिन्हें स्तंभन देवी पीताम्बरा के नाम से जाना जाता है। महाविद्या बगलामुखी महाप्रलय जैसे महाविनाश को स्तंभित करने की पूर्ण शक्ति रखती हैं, देवी स्तंभन कार्य की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। शत्रुओं का नाश तथा कोर्ट-कचैहरी में विजय हेतु देवी की कृपा अत्यंत आवश्यक हैं। देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिय हैं, पीले रंग से सम्बंधित द्रव्य ही इनकी साधना-आराधना में प्रयोग होते हैं, वह पीले फूलों की माला धारण करती हैं, देवी पीले रंग के वस्त्र इत्यादि धारण करती हैं। बगलामुखी देवी की साधना वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग दोनों से की जाती है, जिसे तंत्र की सिद्ध शक्ति कहा जाता है। इनकी दो भुजाएँ हैं बाईं भुजा से इन्होंने शत्रु की जिह्वा पकड़ रखी हैं तथा दाहिने भुजा से इन्होंने मुगदर धारण कर रखी हैं
9. मातंगी : मातंगी महाविद्या जो तंत्र विद्या में तांत्रिक सरस्वती के नाम से भी जानी जाती है। मातंगी महाविद्या को संगीत तथा ललित कलाओं में महारत प्राप्त है। यह दस महाविद्याओं में नौंवी महाविद्या कही जाती है। जिनकी साधना से तन्त्र, असुरी ज्ञान, महान इंद्र-जाल, डामर तन्त्र जैसी विद्या में सफलता प्राप्त होती है, जो संगीत कलाओं में व्यक्ति को निपुण बना देती है, वह मातंगी महाविद्या है।
मातंगी महाविद्या, महाविद्याओं में नौवें स्थान पर विराजमान हैं। मातंगी देवी निम्न जाति और जनजातिओ से सम्बंध रखती हैं। सम्पूर्ण इंद्रजाल की शक्ति से देवी परिपूर्ण है। जिसे सम्मोहन क्रिया या वशीकरण कहा जाता हैं, देवी सम्मोहन विद्या की अधिष्ठात्री मानी गयी हैं। विशेषकर जंगल में वास करने वाले आदिवासियों, जनजातियों द्वारा देवी की पूजा की जाती हैं। इस साधना के द्वारा पूर्ण गृहस्थ सुख की प्राप्ति होती है। जिनके घर में कलह बना रहता है उन्हें यह साधना अवश्य ही करनी चाहिये।
10. कमला महाविद्या : महाविद्या कमला, दस महाविद्याओं में दसवीं महाविद्या कही जाती है, जो दिव्य एवं मनोहर स्वरूप से संपन्न, पवित्रता तथा स्वच्छता से सम्बंधित है। कमल के समान दिव्य महाविद्या कमला जो श्री लक्ष्मी, धन-संपत्ति, सुख, सौभाग्य प्रदाता मानी जाती है। देवी का सम्बन्ध सम्पन्नता, खुशहाल-जीवन, समृद्धी, सौभाग्य और वंश विस्तार जैसे समस्त सकारात्मक तथ्यों से हैं। कमला देवी पूर्ण सत्व गुण सम्पन्न हैं, जिनको स्वच्छता तथा पवित्रता अत्यंत प्रिय हैं, यह देवी ऐसे ही स्थानों में वास करती हैं। कमल के पुष्प के नाम वाली देवी कमला का नाम पद्मपुष्प से सम्बंधित हैं। कमल अपने आप में सर्वदा दिव्य, पवित्र तथा उत्तम है, देवी कमला के स्थिर निवास हेतू अन्तःकरण की स्वच्छता तथा पवित्रता अत्यंत आवश्यक हैं। जो कमला देवी की साधना करते है, उन्हें देवी समस्त प्रकार के सुख, समृद्धी, वैभव इत्यादि सभी प्रदान करती हैं। कमला साधना को कमलेश्वरी कहा गया है, क्योंकि यह साधना साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं।