कुलदेवी देवता कौन होते हैं?

भारत में हिन्दू धर्म से जुड़े विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं। हीन भावनाओं का त्याग करने वाला हिन्दू है। वास्तव में सनातन धर्म ही हिन्दू धर्म है। हिन्दू धर्म विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। मुगलों एवं अंग्रेजों द्वारा इसे मिटाने के बहुत प्रयास किए गए। फिर भी, आज तक कोई हिन्दू धर्म को नहीं मिटा सका।

हिन्दू धर्म में अनेकों देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। लेकिन समाज में जाति के अनुसार के देवी-देवताओं की तरह कुछ अन्य दैविक शक्तियों की पूजा भी की जाती है। इन शक्तियों को कुलदेवी, कुलदेवता अथवा पितृदेव कहा जाता है। मध्यकाल में समस्त आर्यावर्त के निवासियों को एकजुट रखने का आत्मीय प्रयास किया गया। यह कार्य वंश लेखकों, तीर्थ पुरोहितों, पंडों और वंश-परंपरा के वाचकों ने किया। यह प्रयास वैदिक ऋषि परंपरा का ही अद्यतन आदर्श उदाहरण माना जा सकता है।

कुलदेवी देवता का महत्त्व

भारत में हजारों वर्षों से लोग अपने-अपने कुलदेवी और देवता की पूजा करते आ रहे हैं। कुलदेवी और देवता कुल या वंश के रक्षक माने जाते हैं। इसलिए, प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना आवश्यक होता है। यदि ये रुष्ट हो जाएं, तो कोई अन्य देवी या देवता इनके दुष्प्रभाव को कम नहीं कर सकता। इसी वजह से बच्चे का जन्म, विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों में कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाकर पूजा की जाती है, या उनके नाम से स्तुति की जाती है।

कुलदेवी को प्रणाम करने का मन्त्र :

ॐ कुलदेवी नमस्तुभ्यं, कुलवृद्धि प्रदायिनी।
कुल कामप्रदं देवी, सद्य मंगलकारिणी॥

इस पूजा-अर्चना से व्यक्ति को अपने मूल वंश का पता चलता है। साथ ही, परिवार में कुल की धार्मिक परंपराएं भी बनी रहती हैं। कुल को संगठित करने और उसके अतीत को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी-देवताओं को एक स्थान पर स्थापित किया जाता था। इसका उद्देश्य यह था कि उस आध्यात्मिक शक्ति से कुल जुड़ा रहे और वहां से उसकी रक्षा होती रहे। इसीलिए, संबंधित कुल के लोग अपने देवी-देवता के स्थान पर इकट्ठा होते हैं। यह स्थान ही उस वंश या कुल का मूल स्थान होता था।

वंशवृक्ष और गोत्र क्या है ?

प्राचीनकाल में मंदिरों में वंश या कुल से जुड़ा एक व्यक्ति होता था, जिसके पास एक बड़ी-सी पोथी होती थी। इस पोथी में वह अपने कुल से जुड़े लोगों के नाम, पते और गोत्र अंकित करता था। सामान्यतः अपने पिता और दादा का नाम सबको पता होता है। लेकिन परदादा या उससे बड़े पूर्वजों का नाम अक्सर मालूम नहीं होता।

यहीं पर तीर्थ पुरोहितों की भूमिका आती है, क्योंकि उनके पास आपके सभी पूर्वजों के नाम दर्ज होते हैं। इस तरह आप अपने वंशवृक्ष से जुड़े रहते हैं। यह कार्य वैसा ही था, जैसे गंगा किनारे बैठे तीर्थ पुरोहित या पंडे आपके कुल और गोत्र का नाम अंकित करते हैं।

प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी देवी, देवता या ऋषि का वंशज है। गोत्र से यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति किस वंश से संबंधित है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है, तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान माना जाता है।

कुलदेवी देवता को भूलने के परिणाम

समय के साथ कई कारणों से लोग अपने कुलदेवी-देवताओं को भूलते गए। इनमें विदेशी आक्रमणकारियों के भय से पलायन, धर्म परिवर्तन और आक्रांताओं के डर से विस्थापन प्रमुख कारण रहे। इसके अलावा, जानकार व्यक्ति का असमय निधन, संस्कारों का क्षय और विजातीयता या पाश्चात्य मानसिकता का प्रभाव भी इसकी वजह बना। कई बार नए विचारों या संतों के ज्ञानभ्रम में उलझकर भी लोग अपने कुल-खानदान के देवी-देवताओं को भूल गए। परिणामस्वरूप, वे अपने वंश का इतिहास भी भूल बैठे।

कुलदेवी-देवता की पूजा छोड़ने के तुरंत बाद कोई विशेष परिवर्तन नज़र नहीं आता। लेकिन धीरे-धीरे जब देवताओं का सुरक्षा चक्र हटता है, तो परिवार में दुर्घटनाओं का दौर शुरू हो जाता है। इसके साथ ही, परिवार की सफलता भी रुकने लगती है। फलस्वरूप, गृह कलह, उपद्रव और अशांति जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं, और वंश आगे नहीं बढ़ पाता।

गीता में कुलधर्म का महत्त्व

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कुल का नाश तब होता है, जब कोई व्यक्ति अपने कुलधर्म को छोड़ देता है। इस तरह वह अपने मूल और पूर्वजों को हमेशा के लिए भूल जाता है। दूसरे शब्दों में, कुलहंता वह होता है, जो अपने कुलधर्म और परंपरा को छोड़कर किसी अन्य के कुलधर्म को अपना लेता है। अंततः जो वृक्ष अपनी जड़ों से नफरत करता है, उसे अपने पनपने की गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।