हिन्दू धर्म में देवताओं की तरह देवियों की भी आराधना की जाती है। प्रायः सभी देवताओं की शक्तियाँ उनकी पत्नियों के रूप में प्रसिद्ध हैं। कुछ देवियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता भी है और उनके आधार पर संप्रदाय भी संचालित हुए। देवी या देवताओं के सेवकों को गण कहते हैं। देवी और देवताओं के हजारों गण हैं जिनके माध्यम से यह संसार की खबर रखते हैं और कार्य करते रहते हैं, जैसे माता दुर्गा के सेवकों में हनुमान और भैरव का स्थान सर्वोच्च है। मत्स्यपुराण में लोकदेवियों के रूप में लगभग दो सौ देवियों की सूची है। देवियों के कुछ विशिष्ट स्वरूप भी लोकप्रिय हैं। देवियों में आदि शक्ति के रूप में कात्यायनी की बड़ी महिमा है। वैष्णवों में लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा अधिक प्रचलित है, जो क्रमशः श्री और विद्या की अधिष्ठात्री हैं। भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष का पहला विवाह स्वयंभुव मनु की तृतीय पुत्री प्रसूति से हुआ था। प्रसूति से दक्ष की 24 कन्याएं थीं। प्रजापति दक्ष की दूसरी पत्नी का नाम विरणी था जिससे दक्ष की 60 कन्याएं हुई। इस प्रकार दक्ष की 84 पुत्रियां थीं। उक्त कन्याओं और इनकी पुत्रियों को ही किसी न किसी रूप में पूजा जाता है। सभी की अलग-अलग कहानियां हैं, जिनमें से कुछ का विवरण यहां दिया जा रहा हैं:-

1. आदि शक्ति दुर्गा : वेदों में लिखा है कि ईश्वर अजन्मा, अप्रकट और निराकार है। जिसने माता के गर्भ से जन्म लिया या प्रकट हुआ हो, वह ईश्वर नहीं हो सकता। शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी पारब्रह्म ;कालद्ध ने जब द्वितीय की इच्छा प्रकट की और उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ, तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो भगवान सदाशिव है। उस सदाशिव ने अपने शरीर विग्रह से शक्ति की रचना करी, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजायें हैं। उस कालरूपी सदाशिव की अर्धांगिनी हैं आदिशक्ति दुर्गा। यह पराशक्ति, सर्वगुण संपन्न, अष्टभुजाधारी, जगतजननी देवी दुर्गा अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती है। वर्तमान में इन्हें वैष्णो देवी और दुर्गा के नाम से जाना जाता है। माता दुर्गा को पार्वती से जोड़कर 9 रूपों में पूजा जाता है। इसके 9 रूपों के नाम हैं – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण पार्वती को शैलपुत्री कहते हैं।

2. शतरूपा : वर्तमान सृष्टि के प्रथम मानव स्वायंभुव मनु की पत्नी का नाम शतरूपा था। विश्व की प्रथम स्त्री होने के नाते उन्हें जगतजननी भी कहा जाता है। इनके 2 पुत्र प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा देवहूति, आकूति एवं प्रसूति नामक 3 कन्याएं हुई थीं। वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनु और शतरूपा की उत्पत्ति हुई थी। वर्तमान में यह नदी कश्मीर में बहती है।

3. अदिति : वैदिक काल में देवताओं की माता अदिति की पूजा का भी प्रचलन था। अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है। प्रमुख 33 वैदिक देवताओं में अदिति के 12 पुत्र शामिल हैं। समस्त देवकुलों को जन्म देने वाली अदिति देवियों की भी माता है। अदिति को लोकमाता भी कहा गया है। अदिति के पति ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। मान्यता के अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता ‘कला’ कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी।

4. सती और पार्वती : शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली दक्ष की पुत्री सती है जिसने यज्ञ में कूदकर अपनी जान दे दी थी। सती ही आदि शक्ति का अवतार है। सती के विभिन्न अंगों से शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके दो पुत्र गणेश, कार्तिकेय और एक पुत्री अशोक सुंदरी हैं। माता पार्वती को शक्ति और साहस की देवी माना गया है। शिव की तीसरी पत्नी देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है। इसके पुत्र मंगल के नाम पर एक ग्रह का नाम मंगल रखा गया है। भगवान शिव की चैथी पत्नी महाकाली है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला आदि महाकाली के ही रूप हैं।

5. लक्ष्मी : भगवान विष्णु की पत्नी और ऋषि भृगु की पुत्री देवी लक्ष्मी त्रिदेवियों में से एक हैं, जो धन और समृद्धि को देने वाली मानी गई हैं। माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और वह क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ कमल पर निवास करती हैं। समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाली भी यही देवी थी। लक्ष्मीजी को श्रीरूप और लक्ष्मी रूपों में पूजा जाता है। इनका विशेष दिन शुक्रवार को माना गया है। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार का व्रत किया जाता है। माता लक्ष्मी का पूजन अष्टरूपों में किया जाता है। माता लक्ष्मी के 8 रूप हैं- आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी। महालक्ष्मीजी के 4 हाथ बताए गए जोकि 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं।

विशेष : भागवत महापुराण के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी से पहली उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी निकली थीं। जहां देवी लक्ष्मी धन-धान्य की देवी है, उसके विपरीत देवी अलक्ष्मी आलस्य, गरीबी और दरिद्रता की देवी हैं। जिस प्रकार बिना कचरे के कोई चीज नहीं होती, उसी प्रकार अलक्ष्मी के बिना लक्ष्मी भी नहीं रहती। समुद्र से वारुणी यानि मदिरा लेकर निकलने वाली स्त्री ही अलक्ष्मी थीं। देवी अलक्ष्मी का विवाह उद्दालक नामक मुनि से हुआ था। जब मुनि अलक्ष्मी को लेकर अपने आश्रम पहुंचे तो उसने आश्रम में प्रवेश करने से मना कर दिया। कारण पूछने पर कहा कि मैं उन्हीं घरों में जाती हूँ जो गंदे रहते हों। जहां के लोग हर समय लड़ाई-झगड़ा करते रहते हों, गंदे कपड़े पहनते हों और अधर्म या पापकर्म करते हों। मान्यता है कि देवी अलक्ष्मी को तीखी और खट्टी वस्तुएं पसंद हैं और इसीलिए घर और दुकान के बाहर नींबू-मिर्ची टांगे जाते हैं। देवी अलक्ष्मी के विषय में बताई गई बातों से धन हानि के कारणों और उनसे बचाव के बारे में आसानी से जाना जा सकता है।

6. सरस्वती : हिन्दू धर्म की प्रमुख त्रिदेवियों में से एक माता सरस्वती को ज्ञान की देवी माना गया है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में सरस्वती को ब्रह्मा की प्रथम पत्नी के रूप में स्थापित किया गया है। इनकी प्रतिमा ब्रह्मा के साथ पत्नी रूप में कहीं नहीं मिलती। पृथक रूप में देवी सरस्वती की चार भुजाएं हैं, जिनमें वह पुस्तक, अक्षमाला, वीणा या कमंडल धारण करती हैं। हंस पर विराजमान माँ सरस्वती ने धवल वस्त्र धारण किए हैं। उनका एक हाथ प्रायः वरदमुद्रा में रहता है। सरस्वती का पूजन विद्या की अधिष्ठात्री देवी के रूप में होता है। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम माघ शुक्ल पंचमी को सरस्वती पूजन किया था, तभी से यह विद्यारम्भ का दिवस माना जाने लगा। शिक्षण संस्थाओं में बसंत पंचमी को सरस्वती का जन्म दिन समारोह पूर्वक मनाया जाता है। कोई भी शैक्षणिक कार्य से पहले इनकी पूजा की जाती हैं। देवी सरस्वती ने ब्रह्मा जी से सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान पाया था। इसीलिए हिन्दू धर्म में देवी सरस्वती को विद्या एवं ज्ञान की देवी के रूप में पूजा जाता है। प्राचीनकाल में सरस्वती नाम की एक नदी भी थी, जो शिवालिक की पहाड़ियों से निकलकर हरियाणा और राजस्थान में बहती हुई अरब की खाड़ी में मिलती थी। यह नदी अब लुप्त हो चुकी है।

7. सावित्री : ब्रह्मा जी की एक पत्नी का नाम सावित्री देवी है। सावित्री सूर्य की किरणों से उत्पन्न हुई थीं। देवी सावित्री के विषय में अधिक विवरण नहीं मिलता। ब्रह्मा ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिसका नाम गायत्री है। सुहाग की देवी सावित्री का प्रसिद्ध मन्दिर राजस्थान के पुष्कर में विद्यमान है। इतिहास में एक दूसरी सावित्री भी प्रसिद्ध है, जो सत्यवान की पत्नी और मद्रदेश की राजकुमारी थीं तथा जिसने यमराज से अपने मृत पति को जीवित करवा लिया था। वट सावित्री का व्रत इसके नाम से होता है। मद्रदेश के राजा को यह पुत्री सावित्री देवी की आराधना करने से प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने इसका नाम सावित्री रखा।

8. गायत्री : गायत्री को आदिशक्ति के 5 स्वरूपों में से एक माना गया है। गायत्री नाम से ऋग्वेद में एक सबसे लंबा छंद है। शास्त्रों में गायत्री का स्वरूप पंचमुखी बताया गया है। गायत्री को वेदमाता (वेदों की ज्ञाता), देवमाता (ब्रह्मा की पत्नी) और विश्व को वेद ज्ञान देने के कारण विश्वमाता बताया गया है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को गायत्री जयन्ती मनाई जाती है। पद्मपुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने यज्ञ में शामिल होने के लिए वहां मौजूद नन्दिनी गाय के मुख से एक अन्य कन्या ‘गायत्री’ को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया। महाशक्ति गायत्री मंत्र उपासना के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण धारा सरस्वती की मानी गयी है। गायत्री के तत्त्वदशर्न एवं साधन क्रम की एक धारा लक्ष्मी है। गायत्री की सरस्वती धारा का ध्यान करने वाले विद्वान तथा लक्ष्मी धारा का आह्वान करने वाले धनवान बनते हैं। संध्यावंदन में प्रातः सावित्री, मध्यान्ह गायत्री एवं सायं सरस्वती ध्यान से युक्त त्रिकाल संध्यावंदन करने का विधान है। शिक्षा के प्रति मन में अधिक उत्साह भरने, लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता को अधिक गम्भीरता पूवर्क समझने के लिए भी गायत्री पूजन की परम्परा है।

9. श्रद्धा : श्रद्धा, कर्दम ऋषि और देवहूति की 10 संतानों में तृतीय कन्या थी। श्रद्धा का विवाह अंगिरा ऋषि से हुआ था। अन्य कन्याओं के नाम कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती और शान्ति थे तथा एकमात्र पुत्र का नाम कपिल था। कपिल के रूप में देवहूति के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु अवतरित हुये थे। अंगिरा और श्रद्धा से सिनीबाला, कुहू, राका एवं अनुमति नामक पुत्रियां हुई। अंगिरा ऋषि के तीन पुत्र उतथ्य, संवर्त और वृहस्पति प्रमुख थे, जिनमें वृहस्पति देवताओं के गुरु बने।

10. शचि : स्कंद पुराण में पुलोमा पुत्री शचि का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार सतयुग में दैत्यराज पुलोमा की पुत्री शचि ने देवराज इन्द्र को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ज्वालाधाम में हिमालय की अधिष्ठात्री देवी पार्वती की तपस्या की थी। जहां पार्वती ने शचि को दर्शन दिए थे वह स्थान उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में है। यहां माता ज्वालादेवी का एक मन्दिर है। देवी शचि को इंद्राणी कहा जाता है। देवासुर संग्राम में इंद्राणी ने देवताओं की विजय के लिए अपने पति इंद्र के हाथ में ब्राह्मणों द्वारा रक्षासूत्र बंधवाया था। रक्षासूत्र बांधकर जब इंद्र ने युद्ध किया तो देवता विजयी हुए। मान्यता है कि तभी से रक्षाबंधन का यह पर्व शुरू हुआ।

11. गंगा देवी : गंगा पर्वतों के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मैनावती की दूसरी पुत्री थीं। इस प्रकार देवी गंगा माता पार्वती की बहन थीं। गंगा नदी, स्वर्ग की नदी थी जिसे राजा भगीरथ के अथक प्रयासों से धरती पर लाया गया था। गंगा एकमात्र ऐसी नदी है, जो स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल तीनों लोकों में बहती है। इसलिए संस्कृत भाषा में उसे ‘त्रिपथगामिनी’ (तीनों लोकों में बहने वाली) कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि भीष्म भी गंगा के पुत्र थे जो 8 वसुगणों में एक थे और किसी शाप के कारण मनुष्य योनि में गंगा के गर्भ से जन्मे थे।

12. उषा : उषा को सुबह की देवी माना गया है। ऋग्वेद में उषा को द्यौ (आकाश) की पुत्री कहा गया है। आकाश को सर्वश्रेष्ठ देवता तथा सोम को वनस्पति देवता के रूप में माना जाता था। किसी भी प्रकार की चमक या प्रकाश को उषा कहा जाता है। चांद की चांदनी के विशिष्ट अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग होता है। उषा काल को ब्रह्म मुहूर्त भी कहा जाता है। इस समय उठकर सैर, व्यायाम, योगा करने से स्वास्थ्य उत्तम होता है।

13 मातृकाएं : भारतीय मूर्तिविधान और उपासना परंपरा में मातृकाएँ विशेष मान्यता रखती हैं। इनकी संख्या ग्रंथभेद से सात, आठ और सोलह तक गिनाई गई है। सामान्यतः सप्तमातृकाएँ ही विशेष मान्यता प्राप्त हैं और इनमें ब्राम्ही, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वारही, इंद्राणी और चामुंडा की गणना होती है।