जीवन में हमारा जिस व्यक्ति से सम्पर्क होता है उससे एक रिश्ता कायम हो जाता है क्योंकि हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक और स्वतंत्र मान लें, फिर भी हम रूढ़िवादी ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। क्योंकि छवि-रचना के खेल को हमने स्वीकार कर लिया है और परस्पर संबंधों को इन्हीं के आधार पर स्थापित करते हैं। अधिकतर लोगों के लिए, दूसरों के साथ उनके संबंध किसी आवश्यकता या किसी निर्भरता पर टिके होते हैं, वह निर्भरता चाहे आर्थिक हो अथवा मनोवैज्ञानिक। संबंधों की जटिल समस्या यह है कि हम दूसरों पर निर्भर हैं, परंतु स्वावलंबी व आत्मनिर्भर होने की इच्छा मन में बराबर कायम रहती है।

मालिकाना रिश्ते में हम स्वयं को भरा-पूरा, सृजनशील और सक्रिय महसूस करते हैं। मनोवैज्ञानिक निर्भरता वाले संबंध में चेतन व अचेतन भय तथा संदेह अवश्य बने रहते हैं। यदि हम अपने स्वार्थ के लिए किसी अन्य व्यक्ति, समाज या परिवेश पर निर्भर करते हैं तो अपनी सुरक्षा व सुविधा के लिए भी उन पर निर्भर रहने लगते हैं। जीवन संबंधों के बिना चल ही नहीं सकता। क्योंकि समाज कुछ और नहीं बल्कि हमारा ही तो विस्तार है। संबंधों में मनमुटाव का कारण हम स्वयं होते हैं। यह हमारा ही अहं है जो संयुक्त लालसाओं का केंद्र है।

हमें यह बात स्पष्ट रूप से समझनी होगी कि दूसरा हमारे साथ कैसा व्यवहार करता है। यह देखने-समझने से हमें रोकता कौन है? हम देख-समझ इसलिए नहीं पाते, क्योंकि स्वयं के बारे में हमारी राय, आदर्श, विश्वास और परंपराएंदृयह सब परदे बन जाते हैं। यदि हम स्वयं को दूसरों के समक्ष खोल देते हैं, तो सारे संबंध दर्पण की भांति कार्य करने लगते हैं। परंतु यदि हमने पूर्वाग्रहों तथा विश्वासों की पट्टी आंखों पर बांध रखी है तो संबंध कितने भी मर्मस्पर्शी क्यों न हों, हम उन्हें स्पष्ट रूप से, बिना किसी पक्षपात के नहीं देख पाते।

रिश्तों का क्रम इस प्रकार होता है – स्वयं, घर (पति-पत्नि, बच्चे), परिवार (माता-पिता, भाई-बहन), कुटुम्ब (ताऊ, चाचा), गौत्र, गांव, पड़ोसी गांव।

समाज में प्रचलित कुछ मुख्य रिश्ते :-

माँ-बेटी, पिता-पुत्र, दादा-पोता, पति-पत्नि, भाई-बहन, जीजा-साली, देवर-भाभी, बुआ-भतीजी
सास-बहू, देवरानी-जेठानी, चाचा-भतीजा, मामा-भांजा, ससुर-जंवाई, गुरु-चेला, भक्त-भगवान

हमारे रिश्ते पांच प्रकार के होते हैं :-

1. जन्म से पूर्व के रिश्ते – दादा, ताऊ, चाचा, बुआ, नाना, मामा, मौसी। यह दो तरह के होते हैं –
पितृपक्ष के रिश्ते : पिता के पिता को दादा, माता को दादी, बड़े भाई को ताऊ, छोटे भाई को चाचा
बड़े भाई की पत्नी को ताई, छोटे भाई की पत्नी को चाची, बहन को बुआ, बहनोई को फूफा कहते हैं।
पिता के भाई/बहन के बच्चे भाई/बहन होते हैं। पिता के दादा को परदादा कहते हैं।
मातृपक्ष के रिश्ते : माता के पिता को नाना, माता को नानी, भाई को मामा, भाई की पत्नी को मामी,
बहन को मौसी, बहनोई को मौसा कहते हैं। माता के भाई/बहन के बच्चे भाई/बहन होते हैं।

2. जन्म के समय के रिश्ते – माता-पिता, बड़े भाई-बहन।
स्वयं के बड़े भाई की पत्नी को भाभी, छोटे भाई की पत्नी को पुत्री समान मानते हैं।
भाई (ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी के पुत्र) के बच्चों को भतीजा/भतीजी कहते हैं।
स्वयं की बहन के पति को बहनोई (जीजा), बहन (छोटी/बड़ी) के बच्चों को भान्जा/भान्जी कहते हैं।
भाई/बहन के ससुर को मौसा, सास को मौसी कहते हैं। कहीं-कहीं इन्हें समधी भी कहते हैं।
बहन के देवर/जेठ को समधी, बहन की देवरानी/जेठानी को समधन कहते हैं।
बहनोई की बहन को समधन, बहनोई की बहन के पति को भी समधी कहते हैं।

3. जन्म के बाद के रिश्ते – छोटे भाई-बहन, मित्र और पड़ोसी।

4. सामाजिक रिश्ते – ससुराल पक्ष के रिश्ते। यह दो तरह के होते हैं –
पत्नी के पिता को ससुर, माता को सास, बड़ा/छोटा भाई को साला, भाई की पत्नी को सहलज,
बहन को साली, बहन के पति को साढ़ू, पत्नी के भाई/बहनों के बच्चे पुत्र/पुत्री के समान होते हैं।
पति के पिता को ससुर, माता को सास, बड़े भाई को जेठ, बड़े भाई की पत्नी को जेठानी,
छोटे भाई को देवर, छोटे भाई की पत्नी को देवरानी, बहन को ननद, बहन के पति को ननदोई,
ससुर के भाई/बहन के बच्चों को ‘कुटुम्ब’ के जेठ/देवर/ननद आदि कहते हैं।

5. पारिवारिक जिम्मेदारी – पति/पत्नी और बच्चे।
पुत्र की पत्नी को पुत्रवधु, पुत्र के बच्चों को पोता/पोती, पौत्र की पत्नी को पौत्रवधु कहते हैं।
पुत्री के पति को जंवाई, पुत्री के बच्चों को नाती/नातिन कहते हैं।
पुत्र के ससुर को समधि, सास को समधन, साला/साली को बच्चों के समान मानते हैं।
पुत्री के ससुर, सास, जेठ, देवर, ननद आदि सभी समधि या समधन होते हैं।

विशेष :
पिता के भाई/बहन से सम्बन्धित अन्य रिश्ते पितृपक्ष के अनुसार होते हैं।
माता के भाई/बहन से सम्बन्धित अन्य रिश्ते मातृपक्ष के अनुसार होते हैं।
बुआ, बहन, बेटी से सम्बन्धित रिश्ते पितृपक्ष के अनुसार होते हैं।
ताई, चाची, मौसी, मामी से सम्बन्धित अन्य रिश्ते मातृपक्ष के अनुसार होते हैं।
चाचा/ताऊ के बच्चे चचेरे, बुआ के फुफेरे, मामा के ममेरे, मौसी के बच्चे मौसेरे भाई बहन होते हैं।