यह संसार जिसे भौतिक वास्तविकता भी माना जाता है, पांच तत्त्वों का मिश्रण है। लेकिन जब किसी प्राणी के लिए इन पांच तत्त्वों का प्रभाव समाप्त हो जाता है, तब भी यह जीवन चलता रहता है। मृत्यु के बाद भी जो जीवन चलता है, उसके अन्तर्गत तीन लोकों की चर्चा की जाती है – पृथ्वी लोक, स्वर्ग लोक और नरक लोक। स्वर्ग या देवलोक ब्रह्माण्ड के उस स्थान को कहते हैं जहाँ देवी-देवताओं का वास है। स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे यानी पाताल में हैं, इसे अधोलोक भी कहते हैं। अधोलोक यानी नीचे का लोक है। ऊर्ध्वलोक यानी ऊपर का लोक अर्थात् स्वर्ग, मध्य में हमारा ब्रह्माण्ड है। ऊपर उठने की प्रक्रिया को ही ऊर्ध्वगति कहते हैं। जब मनुष्य अपने पाप कर्मों के द्वारा फिर से नीचे गिरने लगता है तो उसे अधोगति कहते हैं। अधोगति में गिरना ही नरक में गिरना होता है।

अंग्रेजी भाषा में इन शब्दों का मतलब थोड़ा संकीर्ण हो गया है। अंग्रेजी में नरक को (Heil) और स्वर्ग को (Hevan) कहा जाता है। इस्लाम में इसे ‘दोजख’ और ‘जन्नत’ कहा जाता है। बौद्ध धर्म में इन्हें निचली और ऊपरी दुनिया कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि एक संसार ऊपर और एक नीचे है। यह केवल सांकेतिक शब्द हैं, जो आपसी समझ और अनुभवों से संबंधित हैं। विस्तृत वर्गीकरण से 14 लोक हैं- पृथ्वी से शुरू करते हुए 7 ऊपर और 7 नीचे। ये हैं- भूर्लोक (मानव), भुवर्लोक (पितृगण), ध्रुवलोक (तारामंडल), स्वर्गलोक (देवी-देवता), महर्लोक/सिद्धलोक (ऋषि-मुनि), तपोलोक (सनकादिक मुनि) और ब्रह्मलोक/सतलोक (ब्रह्मा-सरस्वती)। इसी तरह नीचे वाले लोक हैं- अतल (मयासुर पुत्र बाला), वितल (हटकेश्वर शिव), सुतल (दैत्यराज बलि), रसातल (दानव), तलातल (मयासुर), महातल (विषैले सांप) और पाताल (वासुकि)।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि मृत्यु के बाद जीव की दो प्रकार की गति होती है 1. अगति और 2. गति। अगति के चार प्रकार है- 1. क्षिणोदर्क, 2. भूमोदर्क, 3. अगति और 4. दुर्गति। गति के अन्तर्गत चार लोक बताए गए हैं – 1. ब्रह्मलोक, 2. देवलोक, 3. पितृलोक और 4.स्वर्गलोक। जीव को चार में से किसी एक लोक में जाना पड़ता है। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है। महाभारत में राजा परीक्षित इस संबंध में शुकदेवजी से प्रश्न पूछते हैं तो वह कहते हैं कि यह नरक त्रिलोक के भीतर ही है तथा दक्षिण की ओर पृथ्वी से नीचे जल के ऊपर स्थित है। उस लोक में सूर्य के पुत्र पितृराज भगवान यम रहते हैं तथा अपने दूतों द्वारा लाए हुए प्राणियों को उनके दुष्कर्मों के अनुसार पाप का फल देते हैं। तीनों लोकों में से केवल भौतिक संसार में ही बुद्धि और विवेक सक्रिय होता है। उचित-अनुचित में अंतर करने की क्षमता होती है। शेष लोकों में अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार सुख-दुख भोगे जाते हैं। पुराणों के अनुसार जीवात्मा निम्न 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाती है।

पेड़-पौधे = 30 लाख, कीड़े-मकौड़े = 27 लाख, पशु-पक्षी = 14 लाख
पानी के जीव-जंतु = 9 लाख, पित्तर, देवता, मनुष्य = 4 लाख

आत्मा के मुख्यतः तीन तरह के शरीर होते हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। मरने के बाद व्यक्ति स्थूल शरीर छोड़कर पूर्णतः सूक्ष्म में ही विराजमान हो जाता है। सूक्ष्म रूप में व्यक्ति के कर्मों का हिसाब होने के बाद व्यक्ति दूसरा शरीर धारण कर लेता है, लेकिन कारण शरीर बीज रूप है जो अनन्त जन्मों तक हमारे साथ रहता है। दुनिया के सभी धर्मों में स्वर्ग और नरक का वर्णन किया गया है। यह धारणा है कि ईश्वर ने स्वर्ग और नरक की रचना की है जहां यमराज के मंत्री चित्रगुप्त सभी आत्माओं के कर्मों का हिसाब रखते हैं। मृत्यु के बाद व्यक्ति के साथ क्या होता है, इस संबंध में जनमानस के चित्त पर रहस्य का पर्दा आज भी कायम है। मनुस्मृति में कुल 28 तरह के नरक माने गए हैं जो सभी धरती पर ही बताए जाते हैं। हालांकि कुछ ग्रन्थों में इनकी संख्या 36 तक है।

मनुस्मृति के अनुसार नरकों के नाम इस प्रकार हैं –

1. तामिस्त्र 2. अंधसिस्त्र 3. रौवर 4. महारौवर 5. कुम्भीपाक
6. कालसूत्र 7. आसिपंवन 8. सकूरमुख 9. अंधकूप 10. कृमिभोजनं
11. संदर्श 12. तप्तसूर्मि 13. वज्रकंटक 14. वैतरणी 15. पुयोद
16. प्राणारोध 17. विशसन 18. लालभक्ष 19. सारमेयादन 20. अवीचि
21. अयरूपान 22. क्षरकर्दम 23. रक्षोगणभोजन 24. शूलप्रोत 25. दंतशूल
26. अवनिरोधन 27. पर्यावर्तन 28. सूचीमुख

दरअसल, मनुष्य अपने कर्मों से ही उक्त नरकों में गिर जाते हैं। जैसी मति वैसी गति। जैसी गति वैसा नरक। नरकों से छुटकारा माने के लिए विद्वान लोग वेदों का पालन करने की सलाह देते हैं। पुराणों में मुक्ति के अनेक उपाय बताए गए हैं। जप, तप, यज्ञ, हवन, तीर्थ, व्रत, पूजा, पाठ, रीति-रिवाज आदि दैनिक गतिविधियां धर्म के ही अंग हैं। वेद पठन, प्रार्थना और परमात्मा का ध्यान करके नरकों से बचा जा सकता है। पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। यह तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नरक की यात्रा के लिए है।

पुराणों में वर्णित कुछ नरकगामी कारक :

शास्त्र निषिद्ध कर्मों के आचरण, मनमाने यज्ञकर्म, त्यौहार, उपवास और पूजा-पाठ आदि कर्म करने वाले पुरुष ‘मिश नरक’ में गिराए जाते हैं।
जो देवताओं तथा पितरों का भाग उन्हें अर्पण किए बिना ही अथवा उन्हें अर्पण करने से पहले ही भोजन कर लेता है, वह ‘लालभक्ष’ नामक नरक में यमदूतों द्वारा गिराया जाता है।
गुरुजनों का अपमान करने वाला पापी ‘महाज्वाल’ नरक में डाला जाता है।
वेद शास्त्रों का अपमान करने और उन्हें नष्ट करने वाला ‘लवण’ नामक नरक में गलाया जाता है।
झूठ बोलने वाले, दूसरों को धोखा देने वालों को ‘रौरव’ नरक में भेजा जाता है।
देवताओं से द्वेष रखने वाला मनुष्य ‘मिभक्ष’ नरक में जाता है।
पराई स्त्री और पराए अन्न का सेवन करने वाला पुरुष ‘संदर्श’ नरक में डाला जाता है।
मछली, बकरा, मुर्गा, बिल्ली, सुअर तथा अन्य पशु-पक्षियों को जीविका के लिए पालने तथा मारने वाला मनुष्य भी ‘पूयवह’ नरक में पड़ता है।
दूसरों के घर, खेत, घास और अनाज में आग लगाता है, वह ‘रुधिरान्ध’ नरक में डाला जाता है।