पाप और पुण्य व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों का फल हैं। जिस प्रकार देव-कर्म से सुख और दानव-कर्म से दुख का अनुभव होता है, उसी प्रकार पाप और पुण्य का अनुभव हैं। दैनिक जीवन में कर्म करते समय हम इन्हीं कर्मों का फल पुण्य एवं पाप के रूप में भोगते हैं। उदाहरणार्थ मित्रों की आर्थिक सहायता करना अथवा परामर्श देना पुण्य को आमन्त्रित करना है। यदि कोई व्यापारी अपने ग्राहकों को ठगता है, तो उसे पाप लगता है। एक व्यक्ति आज आपके लिए प्रिय है तो उसका सब कुछ आपको अच्छा लगता है और अगर वह आपकी बात नहीं मानता है तो आपको बुरा लगता है। आपका बेटा, बहू या पत्नी, जो कोई भी आपके अनुकूल चलता है तो कहते हो कि वह बड़ा आज्ञाकारी है, लेकिन ज्यों ही वह आपका विरोध करता है तो आग उगलने लगते हो।

शास्त्रों में लिखा है कि पत्नी अगर सुंदर और सुशील हो, पुत्र आज्ञाकारी हो, सेवक आपकी सेवा करता हो, घर में धन-वैभव हो तो इसी संसार में सुख मिलता है, इसी संसार में स्वर्ग है। किंतु यदि घर का मालिक दुष्ट और व्यभिचारी हो और पत्नी व पुत्र उसकी आज्ञा का पालन ना करते हों तो वहां सुख कैसे हो सकता है? जब मनुष्य अनैतिक आचरण करे, फिर माता-पिता या जो कोई भी हो, उस आचरण में स्वर्ग कैसे देख सकते हैं। स्वर्ग में तो नैतिक लोग रहते हैं, यह तो अनैतिकता का प्रमाण है। व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाले विकार जैसे उत्कंठा, अधिक खाना, लालच, आलस्य, आक्रोश, ईष्र्या और घमंड इन सातों को महापाप कहा जाता है। इनमें से घमंड यानि अहंकार को सबसे बुरा समझा जाता है और इसे सभी पापों की जड़ समझा जाता है। हमारे जिस कार्य से दूसरों का लाभ होता है, उसे पुण्य कहते हैं और जो अच्छा नहीं लगता, उसे पाप कहते हैं।

पुण्य अच्छे कर्मों का फल है, जिनके कारण हम सुख अनुभव करते हैं ।
पाप बुरे कर्म का फल है, जिससे हमें दुख मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि सुख-दुख, लाभ-हानि, यश-अपयश आदि चीजों से ऊपर उठकर हमें अपना कत्र्तव्य पालन करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि संसार में न सुख स्थायी है और न दुख, न लाभ स्थायी है और न हानि। पुण्य एवं पाप हमें अनुभव होने वाले सुख और दुख की मात्रा निर्धारित करते हैं। किसी का बुरा चाहने की इच्छा से कर्म करने पर पाप उत्पन्न होता है। व्यक्ति द्वारा अपने कत्र्तव्यों की पूर्ति नहीं करने पर भी पाप उत्पन्न होता है। वैसे तो हम सब सुखी जीवन की आकांक्षा रखते हैं, परन्तु जिन लोगों को आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा है, वह यह जानते हैं कि आध्यात्मिक पथ में पुण्य भी आवश्यक हैं।

मनुष्य का अच्छे कुल-परिवार में जन्म, धन, दीर्घायु, स्वस्थ शरीर, अच्छे मित्र, अच्छा पुत्र, प्रेम करने वाला जीवन साथी, भगवद्-भक्ति, बुद्धिमत्ता, नम्रता, इच्छाओं पर नियंत्रण एवं पात्र व्यक्ति को दान देने की ओर झुकाव, ऐसे पहलू हैं, जो पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के बिना असंभव है। जब यह सब हो, तो जो पुण्यात्मा इसका लाभ उठाता है और साधना करता है, उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है।
कई बार हम अपराधियों, भ्रष्ट व्यक्तियों, अधिकारियों और राजनेताओं इत्यादि को पाप कर्म में लिप्त देखते हैं और तब भी वह ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जी रहे होते हैं। तब अनेक लोग इससे खिन्न हो उठते हैं कि इन लोगों को इनके पाप का दंड क्यों नहीं मिलता। यह लोग अपने पूर्व जन्मों के पुण्य के कारण सुखी हैं। जब तक इनके पुण्य का भंडार समाप्त नहीं हो जाता, ईश्वर भी कुछ नहीं कर सकते। किन्तु जब पिछले जन्मों में इनके द्वारा संचित पुण्य समाप्त हो जाते हैं, तब इन्हें पाप कर्मों का फल कारागार, बीमारी, दरिद्रता, मृत्यु के पश्चात् नरक की यातनाएं इत्यादि के रूप में भुगतना पड़ता है। संक्षेप में, कोई भी पाप के परिणामों से बच नहीं सकता।

हिंदू धर्मग्रंथ वेदों का संक्षिप्त है उपनिषद और उपनिषदों का सार है गीता। स्मृतियां उक्त तीनों की व्यवस्था और ज्ञान संबंधी बातों को क्रमशः और स्पष्ट तौर से समझाती हैं। पुराण, रामायण और महाभारत आदि में हिंदुओं का प्राचीन इतिहास है। व्यक्ति संसार में अकेला आता है और अकेला जाता है। उसके अच्छे-बुरे कर्म अगले जन्म का निर्धारण करते हैं। इसलिए जन्म से ही ईश्वर की शरण ग्रहण करनी चाहिए और किसी को अपनी तरफ से कोई कष्ट नहीं देना चाहिए। पाप और पुण्य की व्याख्या करते हुए महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है कि ‘परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्’ अर्थात् जीवों को किसी भी प्रकार की सेवा, सहायता करके उन्हें सुख पहुंचाना ‘परोपकार’ पुण्य कर्म है। इसके विपरीत जीवों को किसी भी प्रकार का कष्ट, पीड़ा, दुःख पहुंचाना पाप कर्म है। अर्थात् निस्वार्थ भाव से किए गए कर्मों से पुण्य उदय होता है। विद्वान कहते हैं कि जीवन को धर्मानुसार ढालकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।

अत्यधिक पाप करने वाला व्यक्ति निम्न प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं :-

कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष अथवा पत्थर के रूप में जन्म लेकर दुख भोगना पड़ता है।
मछली, चमगादड़ अथवा गिद्ध इत्यादि हिंसक प्रजातियों में जन्म लेकर जंगलों में भटकते हैं।
यदि पाप कर्म की मात्रा अत्यधिक है, तो उन्हें बार-बार पशु के रूप में जन्म लेना पड़ता है।
निर्धन परिवार में जन्म मिलना, जहां जीवन निर्वाह के लिए अत्यधिक श्रम करना पड़ता है।
भिखारी, कुरूप, विकलांग अथवा व्याधिग्रस्त (बीमार) व्यक्ति के रूप में जीवन जीता है।

प्रायश्चित : हिन्दु धर्म में प्राचीनकाल से मंदिर में जाकर अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने की परंपरा रही है। गुरुकुल में गुरु अपने शिष्यों को प्रायश्चित करने के अलग-अलग तरीके बताते थे। मनुस्मृति और पुराणों में प्रायश्चित करने के महत्व को विस्तार से समझाया गया है। मूलतः अपने पापों की क्षमा भगवान शिव और वरुण देव से मांगी जाती है, क्योंकि क्षमा का अधिकार उनको ही है। कर्म का सिद्धान्त है कि प्रत्येक सकारात्मक कर्म ‘पुण्य’ उत्पन्न करता है और प्रत्येक नकारात्मक कर्म ‘पाप’ उत्पन्न करता है। इसके कारण प्रत्येक व्यक्ति को कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है। यह न्यूटन की गति के तीसरे सिद्धान्त के समान है, जो यह बोध कराता है कि ‘प्रत्येक क्रिया की समतुल्य और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’। जैन धर्म में ‘क्षमा पर्व’ प्रायश्चित करने का दिन है। इस नियम या परंपरा को ईसाई धर्म में ‘कन्फेसस’ और इस्लाम धर्म में ‘कफ्फारा’ कहा जाता है।