शिक्षा का उद्देश्य है ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या वही है, जो मुक्ति दिलाए। आज शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या नियुक्तये’ हो गया है अर्थात् विद्या वही जो नियुक्ति दिलाए। इस दृष्टि से शिक्षा के बदलते अर्थ ने समाज की मानसिकता को बदल दिया है। शिक्षक का पद अत्यंत गरिमापूर्ण होता है। जिस प्रकार खेती के लिए बीज, खाद एवं उपकरण के रहते हुए, अगर किसान नहीं हैं, तो सब बेकार है। उसी प्रकार विद्यालय के भवन, शिक्षण सामग्री एवं छात्रों के होते हुए यदि शिक्षक नहीं हैं तो सब बेकार है। अतः हम सबका यह कत्र्तव्य बनता है कि हम समाज में शिक्षकों को पूर्ण आदर एवं सम्मान प्रदान करें। शिक्षक शब्द निम्न तीन अक्षरों के मेल सेे बना है-

शि – सीखाने वाला
क्ष – क्षमा करने वाला
क – कर्मों द्वारा कामयाबी पर पहुंचाने वाला।
अर्थात् सीखाने, क्षमा करने एवं कामयाबी की राह बताने वाले शिक्षक आत्मज्ञानी एवं महान होते हैं।

हमारे ग्रंथों में गुरु को ईश्वर और परब्रह्म कहा गया है। क्योंकि ईश्वर भी वही करते हैं, जो गुरु का कर्तव्य है। ग्रंथों में लिखा है कि ‘गु’ अक्षर अंधकारवाचक है और ‘रु’ प्रकाशवाचक। गुरु का अर्थ है, जो अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले चले। सिर्फ ज्ञान देना ही गुरु का काम नहीं है, गुरु ही सत्य-असत्य का बोध जगाकर हमारे भीतर विवेक पैदा करता है। वर्तमान भौतिक युग की कृत्रिमता, यांत्रिकता ने सामाजिक परिवेश को निरन्तर परिवर्तनशील बना दिया है। समय के साथ-साथ नए-नए प्रयोगों और दृष्टिकोणों ने हर व्यवसाय एवं पद स्वरुप को बदल दिया है। आज कोई भी कार्य अपने प्राचीन तौर तरीकों से करना असंभव सा हो गया है। ऐसे समय में समाज के शिक्षित, सुशिक्षित वर्ग का दायित्व और भी अधिक संयमित होकर निभाना पड़ता है। यह बात राष्ट्र निर्माता, मार्गदर्शक, स्वस्थ परंपराओं के नियामक शिक्षक वर्ग पर अधिक लागू होती है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी महान् माना गया है क्योंकि वह हमें सही व गलत के बारे में बताता है। व्यक्ति श्रेष्ठ कर्मों का प्रथम श्रेय उसके गुरु को ही जाता है।

मनुस्मृति के अनुसार सिर्फ शिक्षा देने वाला ही गुरु नहीं होता, जो व्यक्ति हमारा मार्गदर्शन करे, उसे भी गुरु समान समझना चाहिए। मनुस्मृति में निम्न 10 गुरु बताए गए हैं-

1. ज्ञान देने वाला, 2. विद्वान गुरु पुत्र, 3. आज्ञाकारी सेवक, 4. धर्मात्मा व्यक्ति, 5. सदाचारी व्यक्ति,
6. सच बोलने वाला, 7. सामथ्र्यवान व्यक्ति, 8. नौकरी देने वाला, 9. परोपकारी व्यक्ति, 10. शुभचिन्तक।

आजकल अभिभावकों की सोच अपने बच्चों के प्रति अधिक संवेदनशील बनती चली जा रही है। वह स्वयं बच्चों को चाँद-तारे, सुख-सुविधाओं से भरकर कत्र्तव्य विमूढ़ बनाते जा रहे हैं। इससे बच्चों में समाज में संघर्ष करने की भावना खत्म होती जा रही है। वह कठिनाइयों का सामना करना नहीं चाहते। अभिभावक हमेशा उनकी सहायता, मदद के लिए तैयार रहते हैं, उन्हें स्वयं कुछ नहीं करने देना चाहते। इसलिए उनको नैतिकता, कर्तव्य परायणता, सजगता का पाठ पढ़ाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। शिक्षक की वेशभूषा का छात्रों पर अत्यंत प्रभाव पड़ता है।

शिक्षक का कर्तव्य छात्रों को केवल शिक्षित करना ही नहीं है, अपितु उन्हें संस्कारी भी बनाना है। यदि अध्यापक यह कार्य नहीं करता तो वह सच्चे अर्थों में अध्यापक कहलाने योग्य ही नहीं है। शिक्षक का कर्तव्य बन जाता है कि अपने बच्चों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक ही सीमित न रखे। पुस्तकीय ज्ञान तो मात्र परीक्षा उत्तीर्ण करने का साधन होता है। अंकों को पाने का एक उपक्रम होता है। लेकिन विभिन्न चीजों से जोड़कर हम उनके व्यक्तित्त्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। उन्हें अच्छा नागरिक और समाज दर्शक बनाकर समाज की छोटी से छोटी चीज से जोड़ें। उन्हें हर उस बात, घटना, विचार, भावना को समझाएं जिससे उन्हें अपने परिवेश, समाज से जुड़ने और समझने में मदद मिले।

आदर्श अध्यापक में निम्न गुण होते हैं :-

1. समय का पालन करना : आजतक जितने कामयाब इंसान हुए हैं, उन सबने समय का पालन किया है। जो इंसान समय की कद्र करता है, समय भी उसकी कद्र करता है। इसलिए बच्चों को समय का पालन सीखाना बहुत जरूरी है। यदि अध्यापक स्वयं समय का ध्यान रखेंगे तो बच्चे उनके अनुकरण अवश्य करेंगे।

2. नम्र भाषा का प्रयोग करना : अध्यापक को हमेशा नम्र भाषा का प्रयोग करना चाहिए। नम्र भाषा का प्रयोग करके कठिन से कठिन कार्य आसानी से करवाया जाता है। छात्रों को भी नम्र भाषा का ज्ञान कराना चाहिए।

3. सहयोग की भावना : अगर विद्यालय को सुचारू रुप से चलाना चाहते हैं, तो सहयोग की भावना शिक्षको में होनी चाहिए। जिसे देखकर बच्चे भी आपस में सहयोग करने की भावना सीखेगें।

4. जात-पात का भेद ना करना : शिक्षक की कोई जाति नहीं होती, उसकी एक ही जातिऋ शिक्षक। उत्तम शिक्षक को जातिगत बातें नहीं करना चाहिए। ईमानदारी एवं निष्ठापूर्वक विषय का ज्ञान कराते हुए पढ़ाना चाहिए।

5. विषय का पूर्ण ज्ञान : जो विषय पढ़ाना है, उस विषय के अध्याय को पहले से पढ़कर विद्यालय जाएं, ताकि बच्चे को उस 40 से 45 मिनट के समय अंतराल में आप अच्छे तरीके से बिना इधर-उधर बातें करते हुए प्रभावी ढंग से बच्चे को अधिगम करा सके।

6. ईमानदारी पूर्वक कक्षा कक्ष का संचालन : कक्षा का संचालन पूरे आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए। ताकि बच्चे ध्यान पूर्वक सुने एवं पूरी निष्ठा के साथ पढ़े।

7. सृजनात्मक होना : अगर अध्यापक सृजनशील हैं, तो बच्चे भी सृजनशील होंगे। क्योंकि अध्यापक बच्चों को सृजनशीलता के बारे में बताते रहते हैं। इससे बच्चों में धीरे धीरे सृजनशीलता आने लगती है।

8. क्रियात्मक एवं रचनात्मक होना : अध्यापक बच्चों को क्रियात्मक एवं रचनात्मक विधि से सिखाते हैं तो सीखा गया ज्ञान हमेशा मददगार होता है। बच्चों में जरूरी है कि वह खुद से प्रयोग करके ज्ञान अर्जित करे।