नैतिक मूल्य : जीवन का आधार
जिस प्रकार किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान के बारे में पढ़ने या सुनने से भी अधिक उसका प्रत्यक्ष दर्शन अधिक प्रभावी होता है, उसी प्रकार जीवन का लक्ष्य हासिल करने के लिए किसी भी विषय का प्रत्यक्ष दर्शन यानी व्यावहारिक ज्ञान सबसे अधिक जरूरी है। किसी विषय को स्वयं पढ़ने की बजाय आचार्य के मुख से श्रवण करने पर धारणा अधिक गहरी होती है, लेकिन प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव सबसे अधिक होता है। जीवन में उपयोगी व्यवहारिक ज्ञान ही नैतिक मूल्य होते हैं। ग्रामीण परिवेश में सीमित कार्यक्षेत्र होने के कारण युवाओं को यह ज्ञान आसानी से प्राप्त हो जाता है। किन्तु शहरी परिवेश में युवा व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने की बजाय मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। शास्त्र या ग्रंथ ईश्वर के निकट पहुंचने का मार्ग भर बताते हैं। एक बार यदि आप सही मार्ग जान लेते हैं, तो फिर ग्रंथ-शास्त्रों की जरूरत ना के बराबर रह जाती है। दो प्रकार के लोग आत्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं- एक तो वह, जिनका मन दूसरों से उधार लिए हुए विचारों से नहीं भरा है और विद्या के बोझ से नहीं लदे हैं। दूसरे वह, जिन्होंने सारा शास्त्र, विज्ञान आदि पढ़ने के बाद यही जाना है कि हम कुछ भी नहीं जानते।
जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझना होगा। इस सम्बन्ध में एक बात जानना आवश्यक है कि पढ़ने से सुनना अच्छा है। सुनने से भी अच्छा है देखना। सुनकर और देखकर समझना ही व्यावहारिक ज्ञान है। किसी आदमी को गांव से चिट्ठी मिली। उसमें रिश्तेदारों के यहां कुछ चीजें सौगात में भेजने की बात लिखी थी। उसने बड़ी उत्सुकता के साथ हाथ में चिट्ठी लेकर पढ़ना शुरू किया और फिर वह उसे छोड़कर उन चीजों का प्रबंध करने चल दिया। चिट्ठी की जरूरत तब तक थी जब तक उसमें लिखी वस्तुओं के विषय में न जान लिया जाए, तदुपरांत व्यावहारिक ज्ञान ही काम आता है।
अधिकार और कर्तव्य का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। वस्तुतः अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब हम कहते हैं कि अमुक व्यक्ति का अमुक वस्तु पर अधिकार है, तो इसका अर्थ यह भी होता है कि अन्य व्यक्तियों का कर्तव्य है कि उस वस्तु पर उस व्यक्ति का ही अधिकार समझें। अतः अधिकार और कर्तव्य सहगामी हैं। हमें यह भी समझना चाहिए कि समाज और राज्य में रहते हुए हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं। अनिवार्य अधिकारों का अनिवार्य कर्तव्यों से नित्य संबंध है। आधुनिक संविधान ने भी स्वतंत्र जीवनयापन के अधिकार और मनुष्यों की समानता को स्वीकार किया है। अधिकार ऐसी अनिवार्य परिस्थिति है जो मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक है। सामान्यतः कर्तव्य शब्द का अभिप्राय उन कार्यों से होता है, जिन्हें करने के लिए व्यक्ति नैतिक रूप से प्रतिबद्ध होता है। इस शब्द से वह बोध होता है कि व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा, अनिच्छा या केवल बाह्य दबाव के कारण नहीं करता, अपितु आंतरिक नैतिक प्ररेणा के ही कारण करता है।
मनुष्य का व्यवहार दो प्रकार का होता है- क्रियात्मक व्यवहार और प्रतिक्रियात्मक व्यवहार। जो व्यक्ति द्वंद्वों की परिधि से मुक्त रहता है, उसका व्यवहार क्रियात्मक होता है। दूसरों का व्यवहार देखकर अनुमान लगाना प्रतिक्रियात्मक व्यवहार होता है। जब एक चिड़िया पेड़ की शाखा या भूमि पर चोंच मारती है, तो हम समझ जाते हैं कि वह कोई अन्न या कीट आदि खा रही है। लेकिन जब हम उसे चोंच में तिनका लेकर उड़ते देखते हैं, तब अनुमान लगाते हैं कि वह नीड़ (घोंसला) बना रही है। मनुष्य चरित्र को परखना भी बड़ा कठिन कार्य है, क्योंकि उसमें विविध तत्त्वों का मिश्रण है। नित्य नई परिस्थितियों से वह बदलता रहता है। प्रयोगशाला की परीक्षण नली में रखकर उसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। एक छोटा बच्चा अनगढ़ पत्थर की तरह है जिसमें सुन्दर मूर्ति छिपी है, जिसे शिक्षक रूपी शिल्पी की आंख देख पाती है। वह उसे तराशकर सुन्दर मूर्ति में बदल सकता है। इसी प्रकार माता-पिता, शिक्षक और समाज बालक को संवारकर खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।
व्यक्तित्व विकास में वंशानुक्रम (Herekity) तथा सामाजिक परिवेश (Enaironment) दो प्रधान तत्त्व हैं। वंशानुक्रम व्यक्ति को जन्मजात शक्तियां प्रदान करता है। सामाजिक परिवेश उसे इन शक्तियों को सिद्धांत के लिए सुविधाएं प्रदान करता है। बालक के व्यक्तित्व पर सामाजिक परिवेश प्रबल प्रभाव डालता है। ज्यों-ज्यों बालक विकसित होता जाता है, वह उस समाज या समुदाय की शैली को आत्मसात कर लेता है, जिसमें वह बड़ा होता है और उस व्यक्ति के गुण ही व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ते हैं। व्यक्ति के इन गुणों का समुच्चय ही व्यक्ति का व्यक्तित्व कहलाता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक ही व्यक्ति आपका उद्धार कर सकता है तथा वही व्यक्ति आपका मित्र और आपका शत्रु भी है और वह आप स्वयं हैं। व्यक्ति का समस्त व्यवहार उसके वातावरण या परिवेश में समायोजन करने के लिए होता है।
प्रत्येक मनुष्य कुछ प्रवृत्तियों के साथ जन्म लेता है। डरना, हंसना, अपनी रक्षा करना, नई बातें जानने की कोशिश करना, दूसरों से मिलना-जुलना, संग्रह करना, पेट भरने के लिए कोशिश करना आदि प्रवृत्तियों की वैज्ञानिक परिभाषा करना बड़ा कठिन काम है। यह स्वाभाविक और जन्मजात प्रवृत्तियां ही मनुष्य की प्रथम प्रेरक होती हैं। मनुष्य को इनकी परिधि में ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित रखना पड़ता है। संग्रह करना, स्वयं को महत्त्व में लाना, रचनात्मक कार्य में सहयोग करना, दया दिखाना, करुणा करना, आचार-विचार करना, बौद्धिकता आदि ऐसी भावनाएं हैं, जो केवल मनुष्य में होती हैं। बीज-रूप में यह प्रवृत्तियां मनुष्य के स्वभाव में सदा रहती है। फिर भी मनुष्य इसका गुलाम नहीं है। यह संतुलन मनुष्य को स्वयं करना होता है। इसीलिए हम कहते हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं स्वामी है। जीवन के तीसरे वर्ष से ही बालक अपना चरित्र बनाना शुरू कर देता है। अपने माता-पिता से हम कुछ व्यावहारिक बात सीख सकते हैं, किन्तु अपना चरित्र हम स्वयं बनाते हैं।
वास्तव में, नैतिक गुणों की कोई एक सूची तैयार नहीं की जा सकती। संक्षेप में हम उन गुणों को नैतिक कह सकते हैं जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में योगदान देने के साथ-साथ किसी अन्य के जीवन में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाए। इस स्थिति को टालने के लिए ही समाज द्वारा मान्यता प्राप्त कुछ मानदंड, इच्छाएं एवं लक्ष्य विकसित किए जाते हैं।
मनुष्य के जीवन में नैतिक मूल्य निर्धारित करने के निम्न छः कारण होते हैं –
1. सैद्धांतिक या बौद्धिक – घर और परिवार में होने वाले सामान्य व्यवहार के आधार पर।
2. आर्थिक या व्यवहारिक – घर की आर्थिक हालात को ध्यान में रखकर।
3. सौंदर्यबोधी – दूसरों की सुख-सुविधाओं को देखकर।
4. सामाजिक या परमार्थवादी – दूसरे लोगों के समझाने या उकसाने के आधार पर।
5. राजनीतिक या सत्ता-सम्बन्धी – राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के आधार पर।
6. धार्मिक या रहस्यात्मक – धर्म गुरु के उपदेश या धार्मिक ग्रन्थों के आधार पर।
अच्छा और बुरा, सही और गलत, गुण और दोष, न्याय और जुर्म, सच्चाई और ईमानदारी, प्रेम और दया, मित्रता और शत्रुता आदि को नैतिक मूल्य कहा जाता है। नैतिक मूल्यों में प्रेम को सर्वोपरि रखा गया है। सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए उनमें परस्पर प्रेम होना चाहिए। मनुष्य में दयालुता नामक सदगुण भी विद्यमान होता है। इसलिए मनुष्य दयालुता के बोध के कारण ही एक-दूसरे की सहायता का प्रयास करते हैं। मानव जीवन में व्याप्त इन मानसिक और सामाजिक अवधारणाओं को परिभाषित करके, नीतिशास्त्र मानवीय नैतिकता के प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास करता हैं। किन्तु जीवन में असल तरक्की और समाज का उत्थान तभी होगा जब हम शिक्षित और संगठित होंगे। शिक्षा के प्रति हम जागरुक हुए हैं, लेकिन हमारी संस्कृति, संस्कार और नैतिक मूल्य पीछे छूट गए है। इसे सहेजना जरुरी है। वरना हमारी मूल पहचान हम खो जाएंगे।