वास्तु शास्त्र का महत्त्व
आदिकाल से ही भवन निर्माण में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्त्व रहा है। वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक-दूसरे के पूरक और अभिन्न अंग हैं। दोनों शास्त्रों का लक्ष्य मानव मात्र को प्रगति एवं उन्नति की राह पर अग्रसर करना है। वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति भी वेदों से हुई है। वास्तु शास्त्र के अनुसार ही यज्ञ मंडप, मन्दिर, देवालय, घर और शहर का निर्माण किया जाता है। घर बनाने या लेने में तिथि, माह और नक्षत्रों पर विचार करने के बाद ही उसके वास्तु पर विचार किया जाता है। उत्तर भारत में वास्तु विज्ञान की नींव विश्वकर्मा ने रखी थी तथा दक्षिण भारत में मय दानव ने। दोनों को ही शिल्पकार, निर्माणकर्ता और यंत्र निर्माता माना जाता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का नक्शा बनाने से घर में सुख-समृद्धि रहती है। यदि वास्तु के अनुसार घर नहीं बनाया जाता है तो वहां नकारात्मकता बढ़ जाती है। घर का निर्माण करने से पहले भूमि पूजन जरूर करवाना चाहिए। यह घर का निर्माण करने की एक शुभ शुरुआत मानी जाती है। घर के कमरे की दीवारों का रंग हल्का हरा, हल्का नीला, आसमानी, पीला रंग या क्रीम रंग उचित माना गया है। जमीन की जांच के लिए एक हाथ लंबा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरकर छोड़ दें। अगर उसमें पानी भरा रहता है तो भूमि श्रेष्ठ है लेकिन यदि पानी सूख जाए तो भूमि अशुभ होती है। हालांकि अशुभ भूमि को छोड़ना संभव नहीं होता, किन्तु वास्तु शास्त्र के अनुसार उसका उपचार करके रहने योग्य बनाया जा सकता है।
वास्तु विज्ञान या वास्तु शास्त्र जिसे भवन निर्माण कला में ‘दिशाओं का विज्ञान’ भी कहा जा सकता है, इसे समझने के लिए सर्वप्रथम दिशाओं के विषय में जानना आवश्यक है। ब्रह्माण्ड में दस दिशाएँ मानी गई हैं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, ईशान, वायव्य, नै)त्य, आकाश और पाताल। यदि आप उगते हुए सूर्य की तरफ मुख करके खड़े होंगे तो आपका मुख पूर्व की ओर होगा, दक्षिण दिशा आपके दाएँ हाथ की तरफ होगी, बाएँ हाथ की तरफ उत्तर दिशा और आपकी पीठ की तरफ पश्चिम दिशा होगी। दो प्रमुख दिशाओं के बीच की दिशा को विदिशा कहते हैं। दस दिशाओं के स्वामी दस दिग्पाल होते हैं। इनमें से प्रथम 4 मुख्य दिशाएं, अन्तिम 4 विदिशा और एक मध्य दिशा होती है। घर की मध्य दिशा को आंगन कहते हैं। आंगन में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए। घर का शौचालय और स्नानगृह अलग-अलग होना चाहिए। यह दोनों जगह एकसाथ होने से घर में क्लेश हो सकता है। आप भी जानिए कि घर में किन बातों का ध्यान रखना सबसे ज्यादा जरूरी है –
1. पूर्व दिशा : पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है। इस दिशा से घर में सकारात्मक व ऊर्जावान किरणें प्रवेश करती हैं। भवन निर्माण में इस दिशा को अधिक से अधिक खुला रखना चाहिए। पूर्व दिशा के स्वामी सूर्य और देवता इन्द्र होते हैं। इस दिशा को पितृस्थान भी माना जाता है। घर का मन्दिर इस दिशा में बना सकते हैं। पूर्व दिशा में दरवाजे और खिडकियां बनाना उपयुक्त रहता हैं। घर के मुख्य द्वार के लिए पूर्व दिशा सर्वोत्तम है।
2. पश्चिम दिशा : यह दिशा सौर ऊर्जा की विपरित दिशा है। अतः इसे अधिक से अधिक बंद रखना चाहिए। इसके स्वामी शनि और देवता वरुण माने गए हैं। पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष और रसोईघर होना चाहिए। इस दिशा में शौचालय भी बना सकते हैं। इस दिशा की भूमि पूर्व से तुलनात्मक रूप में ऊँची होनी चाहिए।
3. उत्तर दिशा : उत्तर दिशा से चुम्बकीय तरंगों का प्रवेश होता हैं। चुम्बकीय तरंगे मानव शरीर में बहने वाले रक्त संचार एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। स्वास्थ्य के साथ ही यह धन को भी प्रभावित करती हैं। वास्तु में इस दिशा में भूमि का सबसे ऊँचा होना अच्छा माना जाता है। इस दिशा के स्वामी बुध और देवता कुबेर माने जाते हैं। इस दिशा में मन्दिर का निर्माण शुभ होता है, बालकनी का निर्माण भी कर सकते हैं। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर धन हानि व कैरियर में बाधा आती हैं।
4. दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यम की दिशा है। इस दिशा में किसी भी प्रकार का खुलापन नहीं होना चाहिए। इस दिशा के देवता यम तथा स्वामी स्वयं काल हैं। घर का प्रमुख द्वार दक्षिण दिशा में शुभ नहीं होता। इस दिशा में धन रखने से असीम वृद्धि होती हैं। इस दिशा में भारी सामान रखने से गृह स्वामी सुखी, समृद्ध व निरोगी होता है। फैक्ट्री में मशीन इसी दिशा में लगाना चाहिए। ऊंचे पेड़ भी इसी दिशा में लगाने चाहिए। शयन कक्ष और बच्चों का अध्ययन कक्ष इस दिशा में बनाना चाहिए।
5. आग्नेय : यह दिशा अग्नि प्रधान होती है, इसलिए इसे आग्नेय दिशा भी कहते हैं। यह ‘अग्नि’ की दिशा है, इस दिशा का स्वामी शुक्र ग्रह को माना गया है। दक्षिण-पूर्व दिशा में अग्नि से संबंधित कार्य जैसे कि किचिन, ट्रांसफार्मर, जनरेटर आदि होना चाहिए। इस दिशा में सेप्टिक टैंक बनाना भी उपयुक्त होता है।
6. ईशान : उत्तर-पूर्व दिशा में दो प्रमुख ऊर्जा ‘चुम्बकीय तरंगें’ और ‘सौर ऊर्जा’ मिलती हैं। इसके स्वामी बृहस्पति और देवता शिव हैं, इसलिए इसे देवताओं का स्थान, ईशान कहते हैं। यह दिशा ‘जल’ की दिशा होती है। इस दिशा में बोरिंग, नलकूप और पूजा स्थल का निर्माण कराना चाहिए। यह स्थान घर में सबसे अधिक खुला होना चाहिए। इस दिशा में मुख्य द्वार का होना वास्तु की दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है।
7. वायव्य : यह दिशा वायु का स्थान हैं। इस दिशा का स्वामी चन्द्र और देवता पवन को माना गया है। उत्तर-पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष बनाएं। इस दिशा में गौशाला, बेडरूम और गैरेज बनाना हितकर होता है। मेहमानों एवं घर के नौकर का कमरा भी इस दिशा में होना चाहिए।
8. नैऋत्य : दक्षिण-पश्चिम दिशा को राक्षस अथवा नैऋत्य दिशा के नाम से संबोधित किया गया हैं। इस दिशा के स्वामी और देवता स्वयं राहू और केतु हैं। नैऋत्य कोण शौचालय की सही दिशा है। इस दिशा में सीढ़ियों का निर्माण भी कर सकते हैं। इस दिशा में गृहस्वामी का कमरा, कैश काउंटर, मशीनें आदि नहीं होना चाहिए। इस दिशा में खुलापन जैसे खिड़की, दरवाजे आदि निर्मित ना करें। गंदे पानी की निकासी इस दिशा से होनी चाहिए।
वास्तु पुरुष कौन हैं?
वास्तु पुरुष को भवन का प्रमुख देवता माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार वास्तु पुरुष भूमि पर अधोमुख स्थित है। यानि उसका मुंह जमीन की तरफ और पीठ ऊपर की ओर हैं। सिर ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में, पैर नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम दिशा में है। इस तरह उनकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में हैं। इसका प्रभाव सभी दिशाओं में रहता है, इसलिए मकान की नींव रखते समय, मुख्य द्वार लगाते समय व गृह प्रवेश के दौरान तथा संतान जन्म एवं विवाह के समय वास्तु पुरुष की पूजा करने का विधान बताया गया है। इससे घर में रहने वाले लोगों को सुख-समृद्धि व यश प्राप्त होता है और वह हर प्रकार के कष्टों से दूर रहते हैं। इनकी पूजा के साथ भगवान शिव, श्री विष्णु, गणेश और ब्रह्मा की पूजा जरूर करनी चाहिए इससे भूमि शुद्ध हो जाती है।
वास्तु सम्मत भवन में निवास करना मनुष्य के लिए सर्वसुख, समृद्धि, सद्बुद्धि एवं संतति प्रदायक होता है। अनेक मतों के अनुसार वास्तुशास्त्र एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें परिमित भूमि, अपरिमित शक्ति में परिवर्तित की जाती है। वह अनाम और अरूप सत्ता जो इस वास्तु मंडल में नियंत्रित की जाती है उसे वास्तु पुरुष कहते हैं। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि, शनिवार, कृतिका नक्षत्र, व्यतीपात योग, भद्रा के मध्य, कुलिका मुहूर्त में भगवान शंकर के पसीने की बूँद से इनकी उत्पत्ति हुई।
ग्रन्थ ‘विश्वकर्मा प्रकाश’ में कहा गया है कि ब्रह्माजी ने इस महाभूत को वास्तु पुरुष की संज्ञा दी। उसने अपने विकराल शरीर से समस्त संसार को आच्छादित कर लिया। उसे देखकर इंद्र सहित समस्त देवगण भयभीत होने लगे और ब्रह्माजी की शरण में जाकर, उनसे प्रार्थना की कि हम सभी इस विशालकाय प्राणी से भयभीत हैं और आपकी शरण में आए हैं कृपया करके हमारी मदद कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा कि इस महाबली को पकड़कर भूमि पर अधोमुख गिराकर इसके ऊपर बैठ जाओ, इससे तुम सब निर्भय हो जाओगे।
ब्रह्माजी के परामर्श पर देवताओं ने उस महाभूत को गिराकर, उस पर आठों दिशाओं में आठ देवता बैठ गए, जिन्हें दिग्पाल कहा जाता है। उस महाभूत ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की, हे प्रभो! आपने इस सम्पूर्ण जगत की रचना की है, किन्तु मेरे बिना अपराध के देवगण मुझे कष्ट दे रहे हैं, कृपया करके मेरी मदद कीजिए। वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने वास्तु शास्त्र के नियमों की रचना की थी। ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया कि तुम पृथ्वी पर निवास करोगे और वहाँ तुम्हारे साथ सभी देवता भी निवास करेंगे। ग्राम, नगर, शहर, मकान, जलाशय, दुर्ग, प्रासाद, उद्यान आदि के निर्माण आरम्भ और गृहप्रवेश के समय जो तुम्हारा पूजन नहीं करेगा, उसे बाधाओं का सामना करना पड़ेगा और अनेक कष्ट भोगने पड़ेंगे। इसीलिए वास्तु नियमों को अनदेखा करने पर मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। तभी से वास्तु पुरुष की पूजा की जाती है। वास्तु पुरुष को प्रत्येक निर्माण का संरक्षक माना गया है यानी वास्तु पुरुष को भवन का प्रमुख देवता माना जाता है।
ध्यान रखने योग्य बातें :
1. मुख्य द्वार (मेन गेट) : मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। मुख्य द्वार के सामने कोई वृक्ष या खम्भा नहीं होना चाहिए। मुख्य द्वार 2 पल्लों से बना हुआ, बीच में से खुलने वाला होना चाहिए। घर के सभी द्वारों पर विशेषतः मुख्य द्वार पर देहरी ;दहलीजद्ध अवश्य बनानी चाहिए। मुख्य द्वार के ऊपर ॐ या स्वस्तिक का चिन्ह बनाना चाहिए। मुख्य द्वार के दोनों ओर शुभ और लाभ अवश्य लिखना चाहिए।
3. रसोईघर (किचन) : अग्नि देवता रसोई से सम्बन्धित होते है। आग्नेय कोण और दक्षिण-पूर्वी दिशा रसोई के लिए सही है। भोजन करते वक्त आपका मुख उत्तर या पूर्व की तरफ होना चाहिए। रसोईघर में पानी का बर्तन और खाना बनाने वाला चूल्हा दोनों अलग स्थान पर होने चाहिए। रसोई में मन्दिर नहीं होना चाहिए।
4. स्टोर रूम तथा वाॅशिंग एरिया किचन के करीब होना चाहिए। इससे आपको खुले आसमान या बाकी चीजों के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। रसोईघर के पास शौचालय नहीं होना चाहिए।
5. पूजा घर (मन्दिर) : वास्तु के अनुसार पूजा घर अथवा मन्दिर घर के ईशान कोण में होना चाहिए। पूजा घर में भगवन की मूर्तियां आमने-सामने नहीं होनी चाहिए। पूजा घर के लिए उत्तर-पूर्व दिशा ही सही दिशा है।
6. ड्राइंग रूम : इस कमरे में टीवी, फर्नीचर या भारी वस्तु दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखनी चाहिए।
7. सीढ़ियां : जिस दिशा में घड़ी घूमती है, उसी दिशा में ही सीढ़ियां बनवानी चाहिए। सीढ़ियां हमेशा विषम संख्या में होनी चाहिए। सीढ़ियों का आकार सामान्यतः 3 फुट लम्बा, 10 ईंच चैड़ा और 7 ईंच ऊंचा होना चाहिए। घर में छत पर या सीढ़ियों के नीचे टूटे-फूटे बर्तन या कबाड़ इकठा ना करें।
वास्तु शास्त्र के कुछ आसान उपाय से आप अपनी जिंदगी को संवार सकते हैं, जैसे प्रतिदिन पूजा-पाठ करना, साफ-सफाई रखना, टूटा-फूटा सामान निकालना, दिशाओं के अनुसार सामान रखना आदि। वास्तु शास्त्र के अनुसार जिन घरों में वास्तु से संबंधित किसी भी प्रकार का दोष होता है वहां पर बीमारियां, परेशानियां, धनहानि, मनमुटाव और विवाद अक्सर पीछा करते हैं। इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि कई बार दिन-रात व्यक्ति मेहनत करता है लेकिन वह वैसी सफलता नहीं प्राप्त करता जैसी उसको अपेक्षा रहती है।