चार्वाक दर्शन का परिचय
चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सि(ांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है। वेदबाह्य दर्शन छः हैं – चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक और आर्हत। इन सभी में वेद से असम्मत सिद्धान्तों का प्रतिपादन है। चार्वाक दर्शन वह दर्शन है जो जन सामान्य में स्वभावतः प्रिय है। जिस दर्शन के वाक्य चारु अर्थात रुचिकर हों वह चार्वाक दर्शन है। चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनिश्वरवादी और नास्तिक तर्कशास्त्री थे।
नास्तिक मत के प्रवर्तक बृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति भारतीय समाज में देवताओं के गुरु के रूप में मान्य हैं। परन्तु भारतीय साहित्य में बृहस्पति एक नहीं हैं। चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक आचार्य बृहस्पति कौन हैं, यह निर्णय कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य है। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका भी कुछ पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र का एक प्रधान आचार्य माना है। एक बृहस्पति शुक्राचार्य का रूप धारकर इन्द्र का सरंक्षण एवं दानवों का विनाश करने के उद्देश्य से अनात्मवाद या प्रपंच विज्ञान की संरचना करता है। इस प्रपंच विज्ञान के फलस्वरूप शुभ को अशुभ एवं अशुभ को शुभ मानते हुए दानव वेद एवं शास्त्रों की आलोचना एवं निन्दा में संलग्न हो जाते हैं।
चार्वाक शब्द की उत्पत्ति चारु वाक्य अर्थात् मीठी बोली बोलने वाले से हुई है। यह नामकरण उन लोगों द्वारा किया गया, जिनका मानना था कि यह लोग मीठी बातों से लोगों को बहकाते थे। चार्वाक परलोक और ईश्वर को नहीं मानते। इस कारण इस दर्शन को लोकायत भी कहते हैं। सर्वदर्शन संग्रह में चार्वाक के मत से सुख ही इस जीवन का प्रधान लक्ष्य है। संसार में दुःख भी है, यह समझकर जो लोग सुख नहीं भोगना चाहते, वह मूर्ख हैं। मछली में काँटे होते हैं तो क्या इससे कोई मछली ही न खाए? चैपाए खेत पर जाएंगे, इस डर से क्या कोई खेत ही न बोवे? इत्यादि। चार्वाक के मत से स्त्री, पुत्र और अपने कुटुम्बियों से मिलने और उनके द्वारा दिये जाने वाले सुख ही सुख कहलाते है। संसार में सुख से खाना-पीना और रहना चाहिये। इस दर्शन में कहा गया है, कि:-
यावज्जीवेत सुखं जीवेद, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत,
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।
अर्थात् जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये। शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?
चार्वाक दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, तेज तथा वायु यह चार ही तत्त्व सृष्टि के मूल कारण हैं। इसके अनुसार चार महाभूतों से अतिरिक्त आत्मा नामक कोई अन्य पदार्थ नहीं है। चैतन्य शरीर का एक गुण है। आत्मा नामक कोई वस्तु है ही नहीं, अतः चैतन्य शरीर का ही गुण या धर्म सिद्ध होता है। अर्थात् यह शरीर ही आत्मा है। इसकी सिद्धि के तीन प्रकार है- तर्क, अनुभव और प्रमाण।
तर्क : आत्मा की सिद्धि के लिये चार्वाक लोग कहते हैं कि शरीर के रहने पर चैतन्य रहता है और शरीर के न रहने पर चैतन्य नहीं रहता। इस प्रकार शरीर ही चैतन्य का आधार अर्थात आत्मा सिद्ध होता है।
अनुभव : मैं स्थूल हूँ, मैं दुर्बल हूँ, मैं गोरा हूँ, मैं निष्क्रिय हूँ, इत्यादि अनुभव हमें पग-पग पर होता है। स्थूलता, दुर्बलता इत्यादि शरीर के धर्म हैं और ‘मैं’ भी वही है। अतः शरीर ही आत्मा है।
प्रमाण : जिस प्रकार गुड, जौ, महुआ आदि को मिला देने से कालक्रम के अनुसार उस मिश्रण में मादक शक्ति उत्पन्न होती है। दही, पीली मिट्टी और गोबर के परस्पर मिश्रण से उसमें सांप, बिच्छू जैसे जहरीले जानवर पैदा होते हैं। पान, कत्था, सुपारी और चूना में लाल रंग न रहने पर भी उनके मिश्रण से मुँह में लालिमा उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार चतुर्भूतों के विशिष्ट सम्मिश्रण से चैतन्य उत्पन्न हो जाता है।
प्रत्यक्ष दिखने वाला संसार ही सत्य है। प्रत्यक्ष के लिये प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा के द्वारा क्रमशः रूप, शब्द, गन्ध, रस एवं स्पर्श का प्रत्यक्ष अनुभव हम सबको होता है। दूर स्थित हरे-भरे वृक्षों को देखकर, वहां पक्षियों का कोलाहल सुनकर, उधर से आने वाली हवा के ठण्डे झोंके से हम वहां पानी की सम्भावना मानते हैं। जल की उपलब्धि वहां जाकर प्रत्यक्ष देखने से ही निश्चित होती है। अतः सम्भावना उत्पन्न करने तथा लोकव्यवहार चलाने के लिये अनुमान आवश्यक होता है किन्तु वह प्रमाण नहीं हो सकता।
तात्पर्य यह है कि वैदिक ग्रन्थों, दर्शनों, पुराणों और स्मृतियों में वर्णित आचार-विचार ‘आस्तिक दर्शन’ का पालन यदि शरीर सुख का साधन है तो उनका अनुसरण करना चाहिये और यदि वह उसके बाधक होते हैं तो उनका सर्वथा सर्वदा त्याग कर देना चाहिये। अतः शरीर को सुख पहुँचाने वाले कार्य करना चाहिये। मरना ही मोक्ष है, मोक्ष का स्वरूप भिन्न-भिन्न दर्शनों में भिन्न-भिन्न है, तथापि चार्वाक उनको मान्यता नहीं देते।
जिस प्रकार आस्तिक दर्शनों में शंकर दर्शन शिरोमणि के रूप में स्वीकृत है उसी प्रकार नास्तिक दर्शनों में सबसे उत्कृष्ट नास्तिक के रूप में शिरोमणि की तरह चार्वाक दर्शन की प्रतिष्ठा निर्विवाद है। चार्वाक को नास्तिक शिरोमणि इसलिए भी माना जाता है कि वह विश्व में विश्वास के आधार पर किसी न किसी रूप में मान्य ईश्वर की अलौकिक सर्वमान्य सत्ता को सिरे से नकार देता है।