वेद शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘विद्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है जानना। इसी विद् धातु से विद्वान (ज्ञानी) और विदित (जाना हुआ) शब्द की उत्पत्ति भी हुई है। अतः वेद का अर्थ हुआ जानने योग्य ज्ञान के ग्रंथ। वेदों का उद्भव सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयं प्रजापति ब्रह्मा द्वारा किया गया था। वेदों को श्रुति ग्रंथ कहते हैं। इन्हें हिन्दू धर्म का सर्वोच्च ग्रंथ माना जाता है। हिन्दू धर्म के मूल और सबसे प्राचीन लिखित ग्रंथ होने का गौरव भी वेदों को ही प्राप्त है। वेदों में ब्रह्मांड, देवता, ज्योतिष, औषधि, खगोल, भूगोल, इतिहास, गणित, धार्मिक संस्कार और सामाजिक रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान दिया गया है।

आइए, जरा विस्तार से जानते हैं कि वेद आखिर क्या हैं? लेकिन, इससे पहले हम आपको दो बातें जरूर बताना चाहेंगे। पहली यह कि 7 नवम्बर 2003 को यूनेस्को (युनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गनाइजेशन) द्वारा वेदपाठ को ‘मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति’ घोषित किया जा चुका है। दूसरा यह कि 2021 में भारत सरकार द्वारा सीबीएसई की तर्ज पर ही वैदिक शिक्षा बोर्ड बनाने की शुरूआत कर दी गई है। वेदों को ईश्वर की वाणी समझा जाता है। वेद, विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ हैं जिनकी ऋचाओं का इस्तेमाल आज भी किया जाता है। इनकी संख्या चार है – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद।

आइए, इनकी विशेषताओं के बारे में थोड़ा समझते हैं:-

1. ऋग्वेद : वेदों में इसे सबसे पहला स्थान प्राप्त है। यह दुनिया का सबसे प्राचीन लिखित ग्रंथ माना गया है। इसमें 10 मंडल हैं जिनमें 1028 सूक्त और लगभग 10600 से अधिक मन्त्र छन्द रूप में दिए गए हैं। सभी मन्त्र सप्तर्षियों अथवा उनके वंशजों द्वारा लिखे गए हैं। ऋग्वेद में अग्नि, वायु, मित्रा, अश्विनी कुमार, इंद्र, विश्वदेवा, सरस्वती, मरुत, प्रजापति, वरुण, उषा, पूषा, सूर्य, रुद्र, सविता आदि देवताओं को समर्पित ऋचाएं शामिल हैं। इनमें से इंद्र को सबसे शक्तिशाली देवता माना गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त में जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानस चिकित्सा, सौर चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा की जानकारी दी गयी है।

2. सामवेद : चतुर्वेद के क्रम में यह दूसरा वेद है। इसमें अलौकिक देवताओं की उपासना के लिए गाये जाने वाले लगभग 1975 मंत्र शामिल हैं। इसमें सभी वेदों के चुने हुए, यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय गाये जाने वाले मन्त्र शामिल हैं। सामवेद में अग्नि, वायु, पूषा, विश्वदेवा, सविता, पवमान, अदिति, उषा, मरुत, अश्विनी, इंद्राग्नि, सोम, वरुण, सूर्य, गौ, मित्रावरुण को समर्पित पद्यात्मक रचनाएं शामिल हैं। गीता में भी कहा गया है कि- वेदानां सामवेदोऽस्मि। भारतीय संगीत के इतिहास में सामवेद संगीत का मूल कहा जा सकता है।

3. यजुर्वेद : यह तीसरा वेद है। इसमें यज्ञ की प्रक्रिया समझाने के लिये गद्य और पद्य मन्त्र दिए गए हैं। यजुर्वेद से उत्तरवैदिक युग की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है। इसमें 40 अध्याय और 3750 मन्त्र दिए गए हैं। मन्त्रों के आधार पर यजुर्वेद की दो शाखाएं ‘कृष्ण यजुर्वेद’ और ‘शुक्ल यजुर्वेद’ मिलती हैं। कृष्ण यजुर्वेद में हवन और यज्ञ की प्रक्रिया में प्रयोग होने वाले गद्यात्मक मन्त्र दिए गए हैं। शुक्ल यजुर्वेद में हवन और यज्ञ के नियम और विधान दिए गए हैं। यजुर्वेद में सविता, यज्ञ, विष्णु, अग्नि, प्रजापति, इंद्र, वायु, धौ, द्यावा, बृहस्पति, मित्रावरुण, पितर, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं को समर्पित ऋचाएं शामिल हैं।

4. अथर्ववेद : चतुर्वेद के क्रम में अन्तिम और चैथा वेद है। इसमें देवताओं की स्तुति के साथ, चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के भी मन्त्र हैं। इसमें गुण, धर्म, आरोग्य के साथ-साथ यज्ञ के लिये कवितामयी मंत्र भी शामिल हैं। इन मंत्रों की कुल संख्या 7260 है। अथर्ववेद में वाचस्पति, पर्जन्य, आपः, इंद्र, ब्रहस्पति, पूषा, विद्युत, यम, वरुण, सोम, सूर्य, आशपाल, पृथ्वी, विश्वेदेवा, हरिण्यम, ब्रह्म, गंधर्व, अग्नि, प्राण, वायु, चंद्र, मरुत, मित्रावरुण, आदित्य आदि देवी-देवताओं को समर्पित ऋचाएं शामिल हैं।

परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित वेदों को समझने के लिए वेदांगों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। जैसाकि वेदांग नाम से ही परिचय मिलता है कि वेदों को समझने के लिए जरूरी हैं वेदांग। इनकी संख्या 6 है :-

1. शिक्षा : इसमें अक्षर ज्ञान के द्वारा वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है।
2. व्याकरण : इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।
3. छन्द : वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि 7 छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।
4. कल्प : वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका वर्णन इसमें किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र।
5. निरुक्त : वेदों में शब्दों के प्रयोग और उनके अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त से मिलता है।
6. ज्योतिष : यहां इसका अर्थ वेदांग ज्योतिष से है। इससे यज्ञ और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है।

वेदों का वर्गीकरण : वेदों को अपौरुषेय भी कहा जाता है। अपौरुषेय का अर्थ है कि वह कार्य जिसे कोई साधारण व्यक्ति ना कर सकता हो, यानी ईश्वर द्वारा किया हुआ। अतः प्रजापति ब्रह्मा को ही वेदों का रचयिता माना जाता है। प्राचीन काल में चारों वेद एक ही थे। बाद में इन्हें पढ़ना और याद रखना कठिन हुआ तो वेदों को चार विभागों में बांटा गया। श्री कृष्ण के समय द्वापर युग की समाप्ति के बाद महर्षि वेदव्यास ने वेदों को 4 भागों में संपादित करके प्रथम बार लिपिबद्ध किया। इन चारों भागों की शिक्षा अपने 4 शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। इनको क्रम से ऋग्वेद पैल को, यजुर्वेद वैशम्पायन को, सामवेद जैमिनी को तथा अथर्ववेद सुमन्तु को सौंपा गया। संसार में शब्द प्रयोग की तीन शैलियां प्रचलित हैं- पद्य (कविता), गद्य (कहानी) और गायन (संगीत)। वेदों के मंत्र भी इन तीन विभागों के अन्तर्गत बंटे हुए हैं। इनमें जहां ऋग्वेद और अथर्ववेद को ‘पद्य विभाग’ में रखा गया है, वहीं ‘गद्य विभाग’ में यजुर्वेद और ‘गायन विभाग’ में सामवेद को रखा गया है। तीन प्रकार की शब्द प्रकाशन शैलियों के आधार पर वेदों के लिये ‘वेदत्रयी’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

महर्षि कात्यायन ने वेदों के चार उपवेद भी बताए हैं। इनके नाम हैं, स्थापत्यवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा आयुर्वेद। इनमें क्रमशः वास्तु, राजनीति, संगीत तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान दिया गया है। स्थापत्य वेद के रचनाकार भृगुवंशी विश्वकर्मा, धनुर्वेद के रचनाकार महर्षि विश्वामित्र, गान्धर्व वेद के रचनाकार देवर्षि नारद तथा आयुर्वेद के रचनाकार धन्वंतरि माने गए हैं। प्रत्येक वेद के चार विभाग होते हैं – संहिता, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद। इनमें से मन्त्र स्वरूप ‘संहिता’ को मूल वेद माना गया है जबकि, शेष तीन इनकी व्याख्या करते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में गद्य रूप में यज्ञ, वेदमन्त्रों तथा देवताओं की व्याख्या की गई है। आरण्यक ग्रन्थों की रचना और अध्ययन अरण्य ;जंगलद्ध में किया जाता था। इनमें आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन दर्शन की बातें लिखी हुई हैं। उपनिषद गुरुकुल की ‘गुरु शिष्य परम्परा’ का आदर्श उदाहरण हैं। इनमें विभिन्न उदाहरणों, दृष्टान्तों, रूपकों, संकेतों, युक्तियों और प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि, आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि गूढ़ रहस्यों का स्पष्टीकरण किया गया है। वेदों पर आधारित 108 उपनिषद निम्न प्रकार विभाजित किये गए है:

ऋग्वेदवेदीय उपनिषद (10) सामवेदीय उपनिषद (16) कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद (32)
शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद (19) अथर्ववेदीय उपनिषद (31)

उपनिषदों में देव-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर सभी को माध्यम बनाकर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गई है। इन कथाओं की रचना वेदों की व्याख्या के उद्देश्य से की गई है। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गई हैं, उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है।