भारतीय संस्कृति में तुलसी को पूजनीय माना जाता है। तुलसी के पौधे को माँ लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में तुलसी से सम्बन्धित कई आध्यात्मिक बातें लिखी हैं। कार्तिक मास में विष्णु भगवान का तुलसी दल से पूजन करने का महात्म्य अवर्णनीय है। भगवान विष्णु को तुलसी बेहद प्रिय है। तुलसी के पत्तों के बिना भगवान विष्णु की पूजा में प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता। भगवान श्रीकृष्ण को भी तुलसी अत्यंत प्रिय है। यदि श्रीकृष्ण को स्वर्ण, रत्न, मोती से बने पुष्प भी चढ़ाए जाएं तो भी तुलसी पत्र के बिना वह अधूरे हैं। श्रीकृष्ण अथवा श्री विष्णुजी तुलसी पत्र के बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते। हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे का बहुत महत्त्व है। धार्मिक महत्त्व होने के साथ-साथ तुलसी को सेहत के लिए भी वरदान माना जाता है।

आयुर्वेद में भी तुलसी को उसके औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्त्व दिया गया है। तुलसी का उपयोग सर्दी-जुकाम, खांसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए काढ़े के रूप में बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। मृत्यु के समय व्यक्ति के गले में कफ जमा हो जाने के कारण श्वसन क्रिया एवं बोलने में रुकावट आ जाती है। तुलसी के पत्तों के रस में कफ मिटाने का विशेष गुण होता है, इसलिए शैय्या पर लेटे व्यक्ति को यदि तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस पिला दिया जाये तो व्यक्ति के मुख से आवाज निकल सकती है।

तुलसी के तीन प्रकार होते हैं- कृष्ण तुलसी, सफेद तुलसी तथा राम तुलसी। इनमें कृष्ण तुलसी सर्वप्रिय मानी जाती है। कृष्ण तुलसी में खड़ी मंजरियाँ उगती हैं। इन मंजरियों में छोटे-छोटे फूल होते हैं। देव और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से तुलसी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मदेव ने उसे भगवान विष्णु को सौंप दिया। देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है। भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण और पांडुरंग (श्री बाला जी) के पूजन के समय तुलसी पत्रों का हार उनकी प्रतिमाओं को अर्पण किया जाता है।

कैसे बनी तुलसी : हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार, समुद्रमंथन के समय अमृत से उत्पन्न तुलसी ने श्री गणेश द्वारा शापित होकर कालनेमि नामक राक्षस की पुत्री वृंदा के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया था। इसलिए भगवान श्री गणेश की पूजा में तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। वृंदा का विवाह समुद्र से उत्पन्न जलन्धर नामक राक्षस से हुआ। उसे वरदान था कि उसकी पत्नी का सतीत्व जब तक नष्ट नहीं होगा तब तक उसे मारना असम्भव होगा। यहां तक कि देवों के देव महादेव भी जलंधर को पराजित नहीं कर सकते थे। जब जलन्धर युद्ध पर जाने लगा तो वृंदा ने कहा कि आप जब तक युद्ध में रहेंगे मैं आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुंगी। भगवान शिव ने उसे मारने के बहुत प्रयत्न किए किंतु उसकी पत्नी वृन्दा के सतीत्व के कारण भगवान शिव उसे मार नही पा रहे थे। जब जलंधर को हराने का सभी उपाय करके देवगण थक गए, तब देवताओं ने जलंधर का नाश करने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है, इसलिए मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता। ब्रह्मा जी ने कहा कि इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है, अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

देवताओं के अनुरोध पर भगवान ने जलन्धर का रूप बनाया और वृंदा के महल में पँहुच गये। जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वह तुरन्त पूजा में से उठ गई और उनके चरण छू लिए। इससे उसका संकल्प टूट गया और युद्ध में भगवान शिव ने जलन्धर का वध कर दिया। उसका कटा हुआ सिर वृंदा के महल में जा गिरा। वृंदा को जब भगवान विष्णु की माया का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को काला पत्थर बनने श्राप दे दिया। भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवताओं में हाहाकार मच गया। जब माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की, तब वृंदा ने जगत कल्याण के लिये अपना श्राप वापस ले लिया और खुद जलन्धर के साथ सती हो गई। उसकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और स्वयं को एक पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी के साथ ही पूजा जायेगा। भगवान विष्णु ने शिला के रूप में वृन्दा के पौधे के रूप से विवाह किया।

जलंधर कौन था : शिव महापुराण के अनुसार जालन्धर का वास्तविक नाम शंखचूड़ था, किन्तु जल से उत्पन्न होने के कारण उसे जलन्धर कहा गया। लिंगपुराण के अनुसार जलन्धर की कद काठी और सूरत भगवान शिव के ही समान थी। जलन्धर पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण का परम भक्त श्रीदामा था। राधा के श्राप के कारण उसका जन्म जलन्धर के रूप में असुर कुल में हुआ। एक बार देवराज इन्द्र, देवगुरू बृहस्पति के साथ शिव दर्शन के लिए कैलाश जा रहे थे। भगवान शिव ने इन्द्र की परीक्षा लेने के लिए वेश बदलकर उनका रास्ता रोक लिया। इन्द्र के कहने पर जब शिवजी रास्ते से नहीं हटे तब इन्द्र ने वज्र का प्रहार करना चाहा। इससे शिव क्रोध से आगबबूला हो गए। उनके नेत्रों से क्रोध की ज्वाला धधकने लगी। देवगुरू बृहस्पति की प्रार्थना पर शिव शान्त हो गए। शिवजी ने उस क्रोधाग्नि को समुद्र में फेंक दिया, जिससे जलंधर का जन्म हुआ। ब्रह्मा के कहने पर समुद्र ने उसका पालन किया। पंजाब का जालंधर शहर इसके नाम से ही बना है। जालंधर में वृंदा का प्राचीन मन्दिर भी बना हुआ है।

शिव अंश होने से वह अत्यन्त शक्तिशाली था। अपने जीवन का कोई उद्देश्य न जानकर वह )षियों को सताने लगा। वह त्रिलोक विजयी बनना चाहता था, इसलिए उसने सबसे पहले देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बैकुण्ठ पर अधिकार करने का प्रयास किया। किन्तु लक्ष्मी ने उसे यह कहकर वापिस भेज दिया कि समुद्र से उत्पन्न होने के कारण वह उसका भाई है। इसके बाद जब उसने कैलाश पर अधिकार करना चाहा तब भगवान शिव से उसका युद्ध हुआ। जलन्धर का विवाह असुर कुल में हिरण्याक्ष के पुत्र कालनेमि की कन्या वृन्दा नामक कन्या से हुआ था। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त और एक पतिव्रता स्त्री थी, जिसके कारण उसका पति जलन्धर और भी शक्तिशाली हो गया।

तुलसी विवाह की परम्परा : मान्यता है कि तुलसी विवाह संपन्न कराने से वैवाहिक सुख मिलता है। तुलसी विवाह केवल विवाहित सुहागिन महिलाएं कर सकती हैं। तुलसी विवाह से कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है, साथ ही घर में श्री, वैभव और सम्पदा बढ़ते हैं। कार्तिक महीने की देवउठनी एकादशी को पूरे चार महीने तक सोने के बाद जब भगवान विष्णु जागते हैं तो सबसे पहले तुलसी से विवाह करते हैं। इस व्रत के शुभ प्रभाव से विवाह में आ रही सारी रुकावटें दूर होने लगती हैं और शीघ्र ही शुभ विवाह का योग बन जाता है। राक्षस कन्या वृंदा को दिए आशीर्वाद के अनुसार भगवान विष्णु ने वृंदा से विवाह करने के लिए द्वापर युग में शालिग्राम के रूप में जन्म लिया। प्रबोधिनी ;देवउठनीद्ध एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने तुलसी से विवाह किया था। इसीलिए कार्तिक मास में तुलसी जी का शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है।

तुलसी के पौधे का महत्त्व :

घर में तुलसी का पौधा शुभ होता है। मान्यता है कि घर में तुलसी होने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है।
तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक तथा पूजन करना मोक्षदायक समझा जाता है।
तुलसी के पौधे के सामने रोज शाम को दीपक जलाने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
तुलसी की पत्तियां कुछ खास दिनों में नहीं तोड़नी चाहिए, जैसे- चंद्रग्रहण, एकादशी और रविवार।
सूर्यास्त के बाद भी तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए, ऐसा करना अशुभ माना जाता है।
भगवान ड्डष्ण के भोग में और सत्यनारायण की कथा के प्रसाद में तुलसी की पत्ती जरूर रखनी चाहिए। ऐसा नहीं करने से प्रसाद सम्पूर्ण नहीं माना जाता।
तुलसी की पत्तियां खाने से खून साफ रहता है। इससे त्वचा और बाल स्वस्थ रहते हैं।
घर के आसपास या घर के अन्दर तुलसी होने से मच्छर और छोटे-छोटे कीड़े नहीं आते हैं।