त्रिवेणी का महत्त्व
प्रकृति के समस्त जीवों के जीवन का मूल आधार वृक्ष हैं। वृक्षों का संरक्षण एवं संवर्धन जीव जगत के लिए बेहद ही अनिवार्य है। गर्मी, सर्दी, वर्षा आदि सब प्रड्डति के सन्तुलन पर निर्भर करते हैं। प्रकृति पर ही हमारा पर्यावरण निर्भर करता है। यदि प्रकृति समृद्ध एवं सन्तुलित होगी तो पर्यावरण भी स्वच्छ होगा और सभी मौसम भी समयानुकूल सन्तुलित रहेंगे। यदि प्रकृति असन्तुलित होगी तो पर्यावरण भी असन्तुलित होगा और अकाल, बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प आदि अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं कहर ढाने लगेंगी। प्राकृतिक आपदाओं से बचने और पर्यावरण को शुद्ध बनाने के लिए हरे वृक्षों का होना अत्यन्त आवश्यक है।
प्राकृतिक सन्तुलन में वृक्ष मुख्य भूमिका निभाते हैं। वृक्ष हमारे जीवन का आधार है। उगता हुआ वृक्ष प्रगतिशील राष्ट्र का प्रतीक है। पीपल, बरगद व नीम के वृक्ष सामाजिक महत्त्व के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्त्व भी रखते हैं। इनके द्वारा उत्सर्जित आक्सीजन और कार्बन-डाइक्साईड गैस के अवशोषण के गुण मानव जीवन के लिए अमोघ वरदान है। इसलिए इन तीनों पौधों को एक साथ ‘त्रिवेणी’ के रूप में स्थापित किया जाता है। यह हमारे जीवन में सुख-समृद्धि को बढ़ाने के साथ जीवन में उन्नति भी प्रदान करता है।
भविष्य पुराण के अनुसार जिसकी संतान नहीं है, उसे संतान की तरह वृक्षों की रक्षा और पालना करनी चाहिए। वृक्ष एक तरह से संतान की तरह ही मानव की उम्र भर सेवा करते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाना चाहिए। पद्मपुराण में तो यहां तक लिखा है कि कुआं, तालाब, बावड़ी आदि ‘जलाशय’ के निकट पीपल का वृक्ष लगाने से व्यक्ति को सैंकड़ों यज्ञ के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। भारतीय संस्कृति में एक वृक्ष लगाना, सौ गाय दान देने के समान माना गया है।
इस सृष्टि में असंख्य जड़ी-बूटियां विद्यमान हैं। जिनको उत्पन्न करने के साथ परमात्मा ने उनके ज्ञान का प्रकाश भी ऋषियों के पावन हृदय में किया। वट वृक्ष स्वभाव से शीतल होने से रक्त तथा पित्त के रोगों को दूर करने वाला है। नीम, पीपल तथा वट वृक्ष, यह तीनों वृक्ष मिलकर ही त्रिवेणी कहलाते हैं। यह महान् वृक्ष शारीरिक रोगों से मुक्ति दिलाकर भवसागर से तारकर पार ले जाते हैं और यथार्थ सच्ची त्रिवेणी तीर्थ बनकर ‘पहला सुख निरोगी काया’ प्रदान करते हैं तथा अन्तिम सुख जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं।
त्रिवेणी लगाना संसार का सबसे श्रेष्ठतम कार्य है। जब त्रिवेणी लगाते हैं तो मन में एक उल्लास छलकता हुआ महसूस होता है। त्रिवेणी (बड़, नीम, पीपल का संयुक्त रूप) का शास्त्रों में विशेष महत्त्व है। हर इंसान को अपने जीवन में एक त्रिवेणी अवश्य लगानी चाहिए। जैसे-जैसे यह त्रिवेणी बढ़ती है वैसे-वैसे आपकी सुख-स्मृद्धि भी बढ़ती जाती है। रातों-रात कुछ नहीं बदला जा सकता। जब एक बीज बोते हैं तो उसे भी बढ़ने में समय लगता है। दूसरों की भलाई के लिए हमने जो सांसे बिताई हैं, वही वास्तविक जिन्दगी है। त्रिवेणी का अध्यात्मिक महत्त्व भी है। त्रिवेणी को शास्त्रों में स्थाई यज्ञ की संज्ञा दी गई है। जो इंसान श्रद्धाभाव एवं अध्यात्मिक भाव से इस त्रिवेणी को लगाता व लगवाता है या इसका पालन-पोषण करता है उसका कोई भी सात्विक कर्म विफल नहीं होता। त्रिवेणी में सभी देवी-देवताओं और पितरों का वास माना जाता है।
यदि समय रहते वृक्षों का संरक्षण और पर्याप्त मात्रा में नये पौधो का रोपण नहीं किया गया, तो हमारी आने वाली पीढियां शुद्ध वायु और जल के लिए तरस जाएंगी और पूरी मानवता पर संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए हम सभी को पर्यावरण के प्रति सचेत हो जाना चाहिए।