हिन्दू धर्म ग्रन्थों में पूर्णिमा, अमावस्या और ग्रहण के रहस्य को स्पष्ट तौर पर उजागर किया गया है। अक्सर पूर्णिमा और अमावस्या के प्रति लोगों के मन में संशय रहता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार की सभी प्राकृतिक और दैवीय शक्तियां दो तरह की होती हैं, जैसे- दिन-रात, अच्छा-बुरा, शुभ-अशुभ आदि। इन शक्तियों के कारण ही मनुष्यों में देवगुण और दैत्य गुण होते हैं। धरती पर उक्त दोनों तरह की शक्तियों का वर्चस्व सदा से रहता आया है। लाभदायक शक्तियों को सकारात्मक शक्तियां और हानिकारक शक्तियों को नकारात्मक शक्तियां कहते हैं। इनके अतिरिक्त संध्याकाल में दिन और रात दोनों के गुण विद्यमान होते हैं।

हिन्दू धर्म ग्रन्थों में सूर्य और चन्द्र की गति और कला के आधार पर समय को दिन, महीने और वर्ष का निर्धारण किया गया। यजुर्वेद में 12 मासों के नाम मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नमः, नमस, नमस्य, इष, ऊर्ज, सहस्र, तपस् तथा तपस्य दिए गए थे। बाद में पूर्णिमा को चन्द्र-नक्षत्र के आधार पर चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन हो गए।

हिन्दू पंचांग में सूर्यपथ पर आधारित 12 महीनों के एक वर्ष में दो अयन होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन। इसी तरह चंद्रपथ पर आधारित 1 माह को दो पक्षों शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित करते हुए 12 मास का एक वर्ष निर्धारित किया गया है। इस प्रकार वर्ष के मान से उत्तरायण में और माह के मान से शुक्ल पक्ष में दैवीय शक्तियां सक्रिय रहती हैं तथा दक्षिणायन और कृष्ण पक्ष में नकारात्मक शक्तियां ज्यादा सक्रिय रहती हैं। शुक्ल पक्ष के 15वें दिन पूर्णिमा होती है; उसके बाद कृष्ण पक्ष की शुरुआत होती है और इसके ठीक 15वें दिन अमावस्या होती है। हिन्दू धर्म में अमावस्या और पूर्णिमा दोनों का समान महत्व है।

अमावस्या क्या है :

शास्त्रों में अमावस्या का स्वामी पितृदेव को माना गया है, इसलिए अमावस्या को पित्तरों की पूजा के लिए उत्तम माना गया है। पुराणों के अनुसार अमावस्या चार प्रकार की होती हैं- सिनीबाला, कुहू, राका एवं अनुमति। यह चारों अंगिरा ऋषि की पत्नी श्रद्धा की पुत्रियां मानी गई हैं। सूर्यास्त से सूर्योदय तक रहने वाली पूर्ण अमावस्या को सिनीबाला कहते हैं। जिस अमावस्या को चन्द्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता अर्थात् जिस तिथि का क्षय और उदय नहीं होता है उसे कुहू अमावस्या कहा जाता है। चतुर्दशी के साथ मिश्रित अमावस्या को राका तथा प्रतिपदा मिश्रित अमावस्या को अनुमति अमावस्या कहते हैं। अमावस्या के दिन नदी में स्नान कर दान-पुण्य और पितृ तर्पण करना लाभकारी माना जाता है।

12 मास की अमावस्याएं :

चैत्र की अमावस्या को दर्श अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन चन्द्रमा पूरी रात दिखाई नहीं देता।
वैशाख की अमावस्या पितृ तर्पण और कालसर्प निवारण के लिए उत्तम है।
ज्येष्ठ मास की अमावस्या को बड़मावस भी कहा जाता है। इस दिन बरगद की पूजा का विशेष महत्त्व है।
आषाढ़ मास की अमावस्या को हलहारिणी अमावस्या कहते हैं। इस दिन किसान हल की पूजा करते हैं। इस दिन विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत और पूजा की जाती है।
श्रावण मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितरों की शांति हेतु यज्ञ-अनुष्ठान और पौधा रोपण करने का महत्व है।
भाद्रपद मास की अमावस्या को सतियां अमावस्या कहते हैं। इस दिन पोला पर्व मनाया जाता है।
आश्विन मास की अमावस्या को मोक्षदायिनी या सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। यह श्रा( पक्ष का अन्तिम दिन होता है। इस दिन जो लोग ज्ञात-अज्ञात पितरों का श्रद्धा और विश्वास के साथ तर्पण करते हैं, पितृ उनका घर सुख-समृद्धियों से भर देते हैं। इस दिन तीर्थों पर पितरों का पिंडदान भी किया जाता है।
कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली पर्व मनाया जाता है। इस दिन महाकाली और लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। कहते हैं कि इसी दिन दोनों ही देवियों का उद्भव हुआ था।
मार्गशीर्ष की अमावस्या भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय है। इस दिन पीपल की पूजा का विशेष महत्त्व है।
पौष अमावस्या सर्वसिद्धिदायक और पितरों को मोक्ष प्रदान करती है।
माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह सबसे बड़ी अमावस्या होती है। इसे आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
फाल्गुन अमावस्या के दिन भगवान शिव और श्री कृष्ण की पूजा का भी विधान है। ऐसा करने वाले को जीवन में सुख-संपत्ति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

पूर्णिमा क्या है :

वर्ष में ऐसे कई महत्वपूर्ण दिन और रात हैं जिनका धरती और मानव मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनमें से ही सबसे महत्वपूर्ण दिन है पूर्णिमा। इनमें चैत्र पूर्णिमा सबसे अधिक विशेष होती है। चैत्र पूर्णिमा पर तीर्थों और पवित्र नदियों में स्नान करके दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन दान व अनुष्ठान के संकल्प लिए जाते हैं। इस दिन सत्य नारायण की कृपा पाने के लिए उपवास रखते हैं और उनकी पूजा करके कथा सुनते हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में महारास रचाया था। पूर्णिमा के दिन अक्सर मन बेचैन रहता है, रात को नींद नहीं आती और कुछ लोगों के मन में आत्महत्या या हत्या करने के विचार भी बढ़ जाते हैं।

12 मास की पूर्णिमाएं :

चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। इस दिन प्रेम पूर्णिमा पति व्रत मनाया जाता है।
वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है।
ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट सावित्री मनाया जाता है।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन कबीर जयंती मनाई जाती है।
श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है।
भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत किया जाता है।
अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।
कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं।
मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है।
पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है। प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान का महत्व है।
माघ की पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है।
फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

पूर्णिमा और अमावस्या के बीच मूल अंतर यह है कि पूर्णिमा को शुभ माना जाता है जबकि अमावस्या को अशुभ माना जाता है। पूर्णिमा पर ध्यान, पूजा-पाठ करने की सलाह दी जाती है जबकि अमावस्या को तंत्र-मंत्र के लिए बेहतर रात माना जाता है क्योंकि इस दिन भूत-प्रेत, निशाचर जीव जैसी आसुरी शक्तियां प्रबल होती है। इसलिए किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात में नहीं किया जाता। हर माह की पूर्णिमा और अमावस्या को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता है ताकि इन दिनों व्यक्ति का ध्यान धर्म की ओर लगा रहे। मान्यता है कि प्रत्येक चैदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा तीन दिन तक संभलकर रहने में ही भलाई है।