हिंदू पंचांग का परिचय
हिन्दू पंचांग, समय को परिभाषित करने की एक प्रणाली है। पंचांग, वैदिककाल से ही सूर्य को जगत की आत्मा मानकर 9 ग्रहों व 27 नक्षत्रों की स्थिति सिद्धान्त पर आधारित होता है। पृथ्वी पर होने वाले दिन-रात के संधिकाल को विभाजित कर एक पूर्ण सटीक पंचांग बनाया गया है। वैदिककाल के पश्चात् आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर आदि जैसे खगोल शास्त्रियों ने पंचांग को विकसित कर उसमें चंद्रकलाओं का भी वर्णन किया। ज्योतिषी ग्रन्थ ‘सूर्य सिद्धान्त’ में सूर्य, चंद्र सहित पृथ्वी आदि सभी ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति, दूरी और गति का वर्णन किया गया है। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है।
1. सौरमास : सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है। एक वर्ष में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक वर्ष में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की 12 राशियों में 27 नक्षत्र स्थित रहते हैं। बारह राशियों को 12 सौरमास माना जाता है। यह मास प्रायः 30 दिन का होता है। मूलतः सौरवर्ष 365 दिन का होता है, इसलिए एक मास में कभी 28, 29, 30 या 31 दिन भी होते हैं।
जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, उस दिन उसी की संक्रांति होती है। इससे ही सौर वर्ष का नया महीना शुरू होता है। सौर वर्ष के दो भाग हैं- छह माह का उत्तरायण और छह माह का दक्षिणायन। मकर संक्रांति के दिन, जब सूर्य कुंभ से मकर राशि में प्रवेश करता है, सूर्य उत्तरायण होता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब पौष या माघ मास चल रहा होता है। हिंदू धर्म अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों के अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थयात्रा करने से पुण्य प्राप्त होता है। जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का समय होता है जबकि चंद्रमास के अनुसार आषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है।
सौरमास के नाम : मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन।
2. चंद्रमास : पंचांग में चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर एक चंद्रमास को दो पक्षों यानि शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। शुक्ल पक्ष में चंद्र कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं। सामान्यतः एक पक्ष में 15 दिन तथा एक महीने में 30 दिन होते हैं। शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला अमान्त मास या मुख्य चंद्रमास है। कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पूरा होने वाला पूर्णिमान्त मास या गौण चंद्रमास है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण किया गया है। इस प्रकार सभी भारतीय हिन्दू त्यौहारों और पर्वों का आधार चन्द्रमास ही होता है।
चंद्रमास के नाम : चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन।
3. अधिमास : ज्योतिषीय गणना के अनुसार सौरवर्ष का मान 365 दिन, 15 घटी और 22 पल है, जबकि चन्द्र वर्ष 354 दिन और 22 घटी का होता है। इस प्रकार दोनों में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घड़ी ;लगभग 11 दिनद्ध का अन्तर पड़ता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिए चंद्रवर्ष 12 मास के स्थान पर 13 मास का हो जाता है। इन बढ़े हुए दिनों को ‘मलमास’ या ‘अधिमास’ कहते हैं। हर 32 महीने और 15 दिन बाद अधिक मास आता है। 32 महीने और 15 दिन के बाद जिस भी महीने की अमावस्या होगी, उसी महीने का अधिमास भी होगा। अधिमास कभी भी पूर्णिमा से शुरू नहीं होता, अमावस्या के बाद ही शुरू होता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्त्पन्न हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्रमास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को अधिक मास की संज्ञा दी जाती है तथा जिस चंद्रमास में दो सूर्य संक्रांति का समावेश हो जाए, वह क्षयमास कहलाता है। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्गशीर्ष व पौष मासों में होता है। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद तथा आश्विन अधिमास हो सकते हैं। एक ही नाम के दो मासों के बीच का माह शुद्ध होता है। पहला कृष्ण पक्ष तथा अन्तिम शुक्ल पक्ष। जिस वर्ष क्षयमास पड़ता है, उसी वर्ष अधिमास भी अवश्य पड़ता है परन्तु यह स्थिति 19 वर्षों या 141 वर्षों के पश्चात् आती है।
4. नक्षत्र मास : आकाश में स्थित तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। साधारणतः यह चंद्रमा के पथ से जुडे हैं। )ग्वेद में सूर्य को भी नक्षत्र कहा गया है। नक्षत्र हमारे आकाश मंडल में मील के पत्थरों की तरह हैं जिससे आकाश की व्यापकता का पता चलता है। नक्षत्रों से ज्योतिषीय गणना करना वेदांग ज्योतिष का अंग है। वैसे तो नक्षत्रों की संख्या 88 हैं किंतु चंद्र पथ पर 27 ही माने गए हैं। चंद्रमा जब अश्विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्रों में विचरण करता है, वह काल नक्षत्रमास कहलाता है। इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्रमास कहलाता है।
नक्षत्रों के नाम : 1. अश्वनि, 2. भरणी, 3. कृतिका, 4. रोहिणी, 5. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. अश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्व फाल्गुनी, 12. उत्तर फाल्गुनी, 13. हस्ता, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मुला, 20. पूर्व आषाढ़ा, 21. उत्तर आषाढ़ा, 22. श्रावण, 23. घनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्व भाद्रपद, 26. उत्तर भाद्रपद, 27. रेवती।
पंचांग के अंग :
पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- वार, तिथि, नक्षत्र, योग और करण। इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। 12 मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ।
1. तिथि : सूर्योदय से प्रारम्भ होकर अगले दिन सूर्योदय तक के समय को तिथि कहते हैं। एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं। तिथियों के नाम हैं – प्रथम (प्रतिपदा), द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और पूर्णिमा। कृष्ण पक्ष में 1-14 और फिर अमावस्या आती है। शुक्ल पक्ष में 1-14 और फिर पूर्णिमा आती है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार तिथियां दिन में किसी भी समय आरम्भ हो सकती हैं और इनकी अवधि उन्नीस से छब्बीस घंटे तक हो सकती है।
2. वार : एक सप्ताह में सात दिन होते हैं जिन्हें वार कहा जाता है, जिनके नाम इस प्रकार है – रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार (बृहस्पति वार), शुक्रवार और शनिवार। सभी वारों के नाम सौरमण्डल के प्रमुख सात ग्रहों की होरा के आधार पर रखे गए हैं। प्रत्येक वार का स्वामी एक ग्रह होता है।
3. नक्षत्र : आकाश में विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले तारामंडल के आकार को नक्षत्र कहते हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है, किन्तु इसकी गणना पूर्व आषाढ़ नक्षत्र के साथ होती है। मूलतः 27 नक्षत्र माने गए हैं। चंद्रमा इन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है।
4. योग : योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं – विषकुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति। कुल 27 योगों में से 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। यह अशुभ योग हैं – विषकुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति। कुछ विशेष कार्य विशेष योग होने पर ही किए जाते हैं।
5. करण : सूर्य और चन्द्र के 6 अंश के अंतर को करण कहते हैं। एक तिथि में दो करण होते हैं – एक दिन के पूर्वार्द्ध में तथा दूसरा दिन के उत्तरार्द्ध भाग में। कुल 11 करण होते हैं – बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वाणिज, विष्टि (भद्रा), शकुनि, चतुष्पाद, नाग, और कस्तुघ्न। करण के चर एवं स्थिर दो प्रकार होते हैं तथा इनकी तीन अवस्थाएं होती हैं। कोई भी करण सुप्त और बैठी हुई स्थिति शुभ में नहीं होती।