हिन्दू धर्म में सूतक और पातक दोनों का ही विशेष महत्त्व है। प्राचीनकाल में जब चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी, तब कोई बीमारी या महामारी फैलती तो लोग अपने पिछले अनुभवों द्वारा बीमारी से बचने के उपाय करते थे। इसीलिए विद्वानों ने लोगों को बीमारी से बचाने और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए धर्म पालन के कुछ नियम बनाएं। उन्हीं नियमों में से एक है सूतक और पातक। सूतक लगने के बाद मन्दिर में जाना वर्जित हो जाता है। इस दौरान परिवार का कोई भी सदस्य ना तो किसी धार्मिक कार्य में भाग ले सकता है और ना ही मन्दिर जा सकता है। घर के मन्दिर में भी पूजा नहीं होती है।

जन्म काल, ग्रहण काल, स्त्री के मासिक धर्म काल और मरण काल में सूतक और पातक का विचार किया जाता है। प्राचीन काल में जिस व्यक्ति के घर या परिवार में सूतक-पातक रहता था, उस व्यक्ति और परिवार के सभी सदस्यों को कोई छूता भी नहीं। वहां का अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता। उस परिवार के सदस्य भी मन्दिर व किसी के घर नहीं जाते। सूतक-पातक के नियमों का पालन करते हुए कुछ दिनों तक अपने घर में ही रहते। सभी के काल में सूतक के दिन और समय का निर्धारण अलग-अलग होता है।

क्षत्रिय का सूतक 3 दिन, ब्राह्मण का सूतक 10 दिन, वैश्य का सूतक 20 दिन और शूद्र परिवार का सूतक 30 दिन का होता था। पीहर में पुत्री के बच्चे का जन्म हो तो 3 दिन का सूतक रहता है, उसकी ससुराल में 10 दिन का सूतक रहता है। नौकर के बच्चे का एक दिन का सूतक होता है।

सूतक क्या है : सूतक का संबंध घर में बच्चे के जन्म के कारण हुई अशुद्धि से है। जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया के दौरान जो सूक्ष्मजीवों की हिंसा होती है, उसमें लगने वाला दोष या पाप प्रायश्चित के रूप में सूतक माना जाता है। जब परिवार में बच्चे का जन्म होता है तो परिवार पर कुछ दिन के लिए सूतक लग जाता है। बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री (प्रसूता) का सूतक 40-45 दिन तक रहता है। उसे इन दिनों पूजा-पाठ से दूर रहना होता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए वुळछ दिनों तक उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उसे घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता था। प्रसूता स्त्री का रसोईघर में जाना या घर का कोई काम करना तब तक वर्जित होता है, जब तक कि घर में हवन ना हो जाए। यह कोई अंधविश्वास नहीं है बल्कि इसका मौलिक उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखना है। प्रसूति स्थान सवा माह तक अशुद्ध रहता है। इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं।

पातक क्या है : गरुड़ पुराण के अनुसार जिस तरह घर में बच्चे के जन्म के बाद सूतक लगता है, उसी तरह परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होने पर लगने वाले सूतक को पातक कहते हैं। पातक का संबंध घर के किसी सदस्य की मृत्यु से हुई अशुद्धि से है। मरण के अवसर पर दाह संस्कार से हुई हिंसा का दोष या पाप प्रायश्चित स्वरूप पातक माना जाता है। सूतक और पातक की परीभाषा इससे अलग भी है। जैसे व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात् गोत्रज तथा परिजनों को विशिष्ट कालावधि तक अशुचिता और अशुद्धि प्राप्त होता है, उसे पातक कहते हैं।

मृतक व्यक्ति के परिजनों को 12 से 13 दिन तथा अंत्येष्टि क्रिया करवाने वाले पुरोहित को 2 से 3 दिन (सपिंडीकरण तक) सूतक पालन कड़ाई से करना होता है। मूलतः यह सूतक काल सवा माह (40 दिन) तक चलता है क्योंकि इस अवधि में नक्षत्र का एक काल पूर्ण हो जाता है। जिस दिन दाह संस्कार किया जाता है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है। सवा माह तक कोई किसी के घर नहीं जाता है। अगर घर का कोई सदस्य बाहर रहता है तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से तेरहवीं तक उसको पातक लगता है। अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान मात्र से शुद्धि हो जाती है।

किसी की शवयात्रा में जाने पर एक दिन, मुर्दा छूने या मुर्दे को कन्धा देने वाले पर 3 दिन की अशुद्धि मानी जाती है। घर में कोई आत्मघात कर ले तो 6 माह का पातक माना जाता है। छह माह तक वहां भोजन और जल ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह मन्दिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मन्दिर में चढ़ाया जाता है। मृतक के अन्य परिजन जैसे मामा, मौसी, बुआ इत्यादि कितने दिनों तक सूतक का पालन करें, यह संबंधों पर निर्भर है। लेकिन जिसका संबंध रक्त से है उसे ऊपर बताए नियमों अनुसार ही चलना होता है।

पालतू पशुओं का सूतक :

सूतक का असर केवल किसी इंसान के जन्म-मरण पर ही नहीं होता है बल्कि घर के पालतू पशु या जानवर के जन्म और मृत्यु पर भी इसका असर होता है। सूतक में दूध देने वाली गाय का दूध 15 दिन, भैंस का दूध 10 दिन और बकरी का दूध 8 दिन तक अशुद्ध रहता है। सूतक काल समाप्त होने पर स्नान तथा पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) सेवन करने से शुद्धि होती है। सूतक/पातक की अवधि में वेद, शास्त्र अध्ययन, पूजा पाठ, आहार-प्रत्याहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती है।

ग्रहण का सूतक :

सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण से 12 घंटे पहले आरम्भ होता है और ग्रहण की पूर्ण समाप्ति के साथ समाप्त होता है। चन्द्र ग्रहण का सूतक ग्रहण से 9 घंटे पहले आरम्भ होता है और ग्रहण की पूर्ण समाप्ति के साथ समाप्त होता है। इस दौरान न भोजन किया जाता है और न ही पकाया जाता है। यदि ग्रहण के पहले खाना तैयार कर लिया गया है तो खाने-पीने की सामग्री में तुलसी के पत्ते डालकर खाद्य सामग्री को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। ग्रहण के दौरान मन्दिरों के पट (द्वार) बंद रखे जाते हैं। देव प्रतिमाओं को भी ढंककर रखा जाता है। ग्रहण के दौरान मूर्ति पूजन या स्पर्श का निषेध है। केवल मंत्र जाप का विधान है। ग्रहण के दौरान यज्ञ कर्म सहित सभी तरह के अग्निकर्म करने की मनाही होती है। ऐसा माना जाता है कि इससे अग्निदेव रुष्ट हो जाते हैं।

वैज्ञानिक आधार : सूतक और पातक सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं है इनका वैज्ञानिक आधार भी है। जब परिवार में बच्चे का जन्म होता है या किसी सदस्य की मृत्यु होती है उस अवस्था में संक्रमण फैलने की संभावना काफी ज्यादा होती है। ऐसे में अस्पताल या घर में नए सदस्य के आगमन पर अथवा किसी सदस्य की अंतिम विदाई के बाद घर में संक्रमण को रोकने के लिए ही सूतक और पातक के नियमों का पालन किया जाता है। बच्चा पैदा होने के बाद महिला के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। साथ ही, अन्य रोगों के संक्रमण के दायरे में आने के अवसर पैदा हो जाते हैं। जब बच्चा प्राकृतिक वातावरण में आता है तो कुछ बच्चों को बीमारियां जकड़ लेती हैं और शारीरिक कमजोरियां बढ़ने लगती है। इसलिए कुछ दिनों के लिए महिला को बाहरी लोगों से दूरी बनाकर रखा जाता है। जब सूतक और पातक की अवधि समाप्त हो जाती है तब घर में हवन करके वातावरण को शुद्ध किया जाता है। उसके बाद परमपिता परमेश्वर से नई शुरूआत के लिए प्रार्थना की जाती है।

यदि आप किसी के अंतिम संस्कार में गए हैं तो घर जाकर नहाना जरूरी होता है। किसी की मृत्यु के पीछे कई कारण हो सकते है जैसे कोई लंबी सांस की बीमारी या शुगर की समस्या या फिर किसी एक्सिडेंट के चलते मृत्यु हो जाना। कारणों की फेहरिस्त कम नहीं है लेकिन यह सारे कारण आपके शरीर में संक्रमण के जरिए आ सकते हैं और आपको भी रोगी बना सकते हैं। कभी-कभी देखा गया है कि कोई आदमी दाह संस्कार के बाद बीमार पड़ जाता है क्योंकि वहां के कीटाणु उसके घर तक रास्ता बना लेते हैं। इसलिए हमेशा बच्चे, बूढ़े और महिलाओं को अतिरिक्त सावधानी रखने की सलाह दी जाती है। कहीं-कहीं घर के सभी सदस्य अपना मुंडन कराते हैं।
उपरोक्त प्रक्रियाओं का अनुसरण होने पर भी जब कभी परिवार में संक्रमण की संभावनाएं बरकरार रहती है तो अंतिम शस्त्र के रूप में हवन किया जाता है। हवन होने के बाद घर का वातावरण शु( हो जाता है और सूतक/पातक प्रक्रिया की अवधि भी पूरी हो जाती है।

सूतक-पातक के नियम :

सूतक और पातक में अन्य व्यक्तियों को स्पर्श न करें।
कोई भी धार्मिक अथवा मांगलिक कार्य न करें तथा सामाजिक कार्य में भी सहभागी न हों।
किसी के घर न जाएं और ना ही किसी भी प्रकार का भ्रमण करें। घर में ही रहकर नियमों का पालन करें।
किसी का जन्म हुआ है तो शुद्धि का ध्यान रखते हुए भगवान का भजन करें और यदि कोई मर गया है तो गरुड़ पुराण सुनकर समय गुजारें।
सूतक या पातक काल समाप्त होने पर स्नान तथा पंचगव्य सेवन कर शुद्ध हो जाएं।
सूतक पातक की अवधि में देव, शास्त्र, गुरु, पूजन आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती है।
सूतक-पातक के नियमों का पालन करते हुए उतने दिनों तक अपने घर में ही रहना होता है। परिवार के सदस्यों को सार्वजनिक स्थलों से दूर रहने को बोला जाता है।