विवाह के नियम
शादी अथवा विवाह दो परिवारों के मध्य एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त सम्बन्ध है, जो उनके बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ का मूल है। यह मानव प्रजाति के स्थायित्व को बनाए रखने का माध्यम भी है। आदिकाल में विवाह जैसा कोई संस्कार नहीं था। मान्यता है कि भारतवर्ष में ‘श्वेतकेतु’ ने सर्वप्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित की। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। अतः वैदिक ऋषियों ने बहुत सोच-समझ कर विवाह के कुछ नियम बनाए और अनैतिक विवाह-सम्बन्धों को समाज में निषेध किया गया। हिंदू समाज में यह विश्वास प्रचलित है कि स्त्री, पुरुष का आधा अंश है। मनुष्य तब तक अधूरा रहता है, जब तक वह विवाह करके संतान उत्पन्न नहीं कर लेता। पितरों की आत्मा का उद्धार पुत्रों के पिंडदान और तर्पण से ही होता है, इस धार्मिक विश्वास ने भी विवाह को हिंदू समाज में आवश्यक कर्तव्य बताया है। विवाह का धार्मिक महत्त्व होने से ही अधिकांश समाजों में विवाह की विधि एक धार्मिक संस्कार मानी जाती रही है।
प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे हैं। हिन्दुओं में रात को शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि यह निशाचरी समय होता है? प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे। मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद से हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने पर विवश होना पड़ा था। भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह पंजाब में सुन्दरी और मुन्दरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था, जिनका विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था।
भारतीय संस्कृति में समाज का वर्गीकरण आनुवंशीय समूह के रूप में परिभाषित है। प्रत्येक समाज में एक विशाल बाहरी वृत्त होता है जिसे धर्म कहते हैं। इस वृत्त से बाहर किसी व्यक्ति के साथ वैवाहिक संबंध वर्जित होता है। किंतु इस बड़े वृत्त के भीतर छोटे-छोटे समूहों के अनेक वृत्त होते हैं, जिन्हें जाति कहते हैं। सामाजिक रूप से अन्र्तजातिय विवाह भी उचित नहीं माने जाते। इन जातियों के बीच में विजातिय समूह भी पाया जाता है जिसे गौत्र कहा जाता है। गौत्र, व्यक्ति को अपने कुटुम्ब द्वारा मिली वंशावली की पहचान है। प्रत्येक व्यक्ति को इस छोटे वृत्त समूह के बाहर, किंतु बड़े वृत्त के भीतर ही विद्यमान किसी अन्य समूह के व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित होता है। अधिकांश वन्य एवं सभ्य जातियों में भी अपनी नस्ल या प्रजाति से बाहर विवाह करना वर्जित होता है। इसी प्रकार अपनी जनजाति से बाहर भी विवाह निषिद्ध होता है।
गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए प्रमुख संस्कार विवाह संस्कार है। इसे हमारे नीतिक ग्रंथों में संस्कार की संज्ञा दी गई है जिसका मुख्य उद्देश्य जीवन को संयमित बनाकर संतानोत्पत्ति करके जीवन के सभी ऋणों से उऋण होकर मोक्ष के लिए कर्म करें। इसलिए विवाह के कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं। यह नियम वर पक्ष और कन्या पक्ष दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं:-
※ हिन्दू विवाह नियम के अनुसार दोनों पक्षों का एक ही जाति का होना आवश्यक है।
※ दूसरी जाति या धर्म में विवाह करने वाला कुलहंता कहलाता है। इससे कुलदेवता नाराज होते हैं।
※ लड़के या लड़की के परिवार व रिश्तेदारों का सामाजिक व्यवहार देखकर रिश्ता निश्चित करें।
※ विवाह के समय लड़के की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और लड़की की आयु 18 वर्ष होनी चाहिए।
※ कुंडली मिलान के लिए दोनों के जन्म नाम लेना ही शास्त्रोक्त और आवश्यक है। यदि जन्म का नाम ज्ञात न हो तो प्रसिद्ध या प्रचलित नाम लेकर गुण मिलाए जा सकते हैं।
※ विवाह के लिए वर व कन्या की कुंडली मे जो गुण मिलान किया जाता है उसे अष्टकूट मिलान कहते है। इसके अन्तर्गत लड़के व लड़की की कुंडली में आठ प्रकार के गुण मिलाए जाते है। इसमें अधिकतम 36 अंक होते है जो इस प्रकार हैं – वर्ण (1), वैश्य (2), तारा (3), योनि (4), मैत्री (5), गण (6), भकूट (7), और नाड़ी (8)। विवाह के लिए न्यूनतम निर्धारित 18 अंक (गुण) मिलने आवश्यक होते हैं।
※ वर एवं कन्या पक्ष दोनों सगोत्रीय अर्थात् एक गोत्र के नहीं होने चाहिए।
※ एक पक्ष का गोत्र एवं दूसरे पक्ष के नानी/दादी का गोत्र भी एक ही नहीं होना चाहिए।
※ वर एवं कन्या पक्ष दोनों एक ही परिवार अथवा गांव के भी नहीं होना चाहिए।
※ दो सगी बहनों का विवाह एक साथ, दो सगे भाइयों से उचित नहीं होता। अलग-2 कर सकते हैं।
※ भाई-बहन का एक-दूसरे के परिवार में (अदल-बदल) विवाह उचित नहीं होता। इससे रिश्ते बिगड़ते हैं।
※ एक ही परिवार में बुआ-भतीजी व चाचा-भतीजा का विवाह उचित नहीं होता। इससे रिश्ते बिगड़ते हैं।
※ भाई-बहनों का विवाह एक साथ न करें। लड़की के विवाह के 6 माह बाद लड़के का विवाह हो सकता है।
※ कुल में विवाह होने पर 6 माह तक मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ संस्कार) चूड़ाकर्म आदि मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए। किंतु 6 मास के भीतर ही यदि संवत्सर बदल जाता है तो यह कार्य किए जा सकते हैं।
※ पति या पत्नी को पहले पति या पत्नी के विद्यमान रहते हुए दूसरा विवाह नहीं करना चाहिए।
※ दोनों पक्षकारों में से कोई भी एक विवाह के समय जीवित या विद्यमान नहीं है, तब दूसरा विवाह कर सकते हैं, इसे द्विज/विधवा/विधुर विवाह की श्रेणी में माना जाता है।
※ विवाह के लिए गणेश पूजन (बान) हो जाने के पश्चात् यदि दोनों में से किसी के भी कुल में कोई मृत्यु हो जाती है तो उनके माता-पिता को सूतक नहीं लगता। निश्चित तिथि पर विवाह किया जा सकता है।
※ हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे सामान्यतः किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जाना चाहिए। विशेष परिस्थिति में सम्बन्ध-विच्छेद किया जा सकता है।
परंपरागत रूप से, विवाह का आयोजन चातुर्मास अथवा वर्षाकाल की समाप्ति के बाद होता है। इसकी शुरुआत तुलसी विवाह से होती है, जिसमें विष्णुरूपी गन्ना का विवाह लक्ष्मीरूपी तुलसी के पौधे के साथ किया जाता है। यह पर्व दीपावली के बाद मनाया जाता है। मनुष्य के ऊपर देव ऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण – यह तीन ऋण होते हैं। यज्ञादि से देव ऋण, स्वाध्याय से ऋषि ऋण तथा उचित रीति से विवाह करके एवं पितरों के श्राद्धतर्पण के योग्य धार्मिक एवं सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके पितृ ऋण का परिशोधन होता है। इस प्रकार परंपरा सुरक्षित रखने के लिए संतान उत्पन्न करना विवाह का परम उद्देश्य है। इसलिए हिन्दू धर्म में विवाह को एक पवित्र संस्कार के रूप में मान्यता दी गयी है।
पति या पत्नी की संख्या के आधार पर विवाह के तीन रूप माने जाते हैं: बहुर्भायता, बहुभर्तृता, एक पति/पत्निक विवाह। जब एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है तो इसे बहुभार्यता या बहुपत्नीत्व कहते हैं। मानव जाति के विभिन्न समाजों में इनमें से पहला और तीसरा रूप अधिक प्रचलित है। दूसरे रूप बहुभर्तृता का प्रचलन बहुत कम है।
राजपूत विवाह और तमिल विवाह पद्धति में बहुत अंतर दिखता है। मलयाली हिन्दू विवाह अब इतना सरल, सहज हो गया है कि इसमें वर और वधु के परिजनों की उपस्थिति में वर द्वारा उसकी भावी पत्नी के गले में एक धागा डाल देना ही पर्याप्त है। इस संस्कार में एक मिनट भी नहीं लगता, वहीं दूसरी ओर शाही मारवाड़ी विवाह को संपन्न होने में कई दिन लग जाते हैं। कई धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है, जिसे किसी सामान्य परिस्थिति में भी तोड़ा जा सकता है।