सनातन और वैदिक संस्कृति के अनुसार सोलह संस्कारों का बड़ा महत्त्व है और विवाह संस्कार उन्हीं में से एक है। हिन्दू धर्म में विवाह एक पवित्र और आवश्यक संस्कार माना गया है। विवाह का शाब्दिक अर्थ है- वि + वाह = विवाह, अर्थात् उत्तरदायित्व का वहन करना या जिम्मेदारी उठाना। विवाह का उद्देश्य है- पुरुष द्वारा स्त्री को विधिपूर्वक उसके पिता के घर से अपने घर ले जाना। विवाह से पूर्व घर के बुजुर्गों तथा गुरुओं की सहमती अवश्य लेनी चाहिए। विवाह समाज का एक सुव्यवस्थित स्तम्भ है। समस्त ऋषियों की पत्नी हुआ करती थीं, जो आध्यात्मिकता में ऋषियों के बराबर होती थीं। शिक्षा समाप्ति के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कराया जाता था। इसके अन्तर्गत लड़का और लड़की दोनों साथ रहकर धर्मपालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं।

पाणिग्रहण संस्कार को ही सामान्यतः विवाह के नाम से जाना जाता है। सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवन भर साथ निभाने का वादा करते हैं। विवाह के समय कन्या वर के वामांग (बांई ओर) बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। दोनों एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है। इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं। वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव न हो, तो आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित समझाएँ।

वर की प्रतिज्ञाएँ :

मैं आज से धर्मपत्नी को अर्धांगिनी घोषित करते हुए अपने शरीर के अंगों की तरह ध्यान रखूँगा।
आज से धर्मपत्नी को गृहलक्ष्मी का पूर्ण अधिकार सौंपता हूँ। गृह व्यवस्था में आमदनी और खर्च में उसके परामर्श को महत्त्व दूँगा।
सदैव पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और स्नेह देता रहूँगा। पूरी निष्ठा से इसका पालन करूँगा।
स्वयं दृढ़ता से पत्नीव्रत धर्म का पालन करूँगा। मन और वचन से पर नारी से सम्बन्ध नहीं रखूंगा।
धर्मपत्नी के सुख और सुरक्षा में पूरी ईमानदारी से अपनी शक्ति और साधन को लगाता रहूँगा।
आपसी मतभेद भूलकर, मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का प्रयत्न करूँगा। किसी के सामने पत्नी को लांछित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।
पत्नी के असमर्थ या अपने कर्तव्य से विमुख हो जाने पर अपने सहयोग और कर्तव्य पालन में कोई कमी नहीं रखूँगा।

कन्या की प्रतिज्ञाएँ :

मैं अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके सच्चे अर्थों में अर्धांगिनी बनकर रहूँगी।
पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए, श्रद्धाभाव रखकर सदैव उनके अनुकूल रहूँगी। अविलम्ब उनके निर्देशों के पालन का अभ्यास करूँगी।
पति के परिजनों के साथ शिष्टता बरतूँगी। सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी।
स्वयं दृढ़ता से पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी। मन और वचन से पर पुरुष से सम्बन्ध नहीं रखूंगी।
फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।
नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है। यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।
परिवार के सदस्यों में संस्कारों के विकास तथा उन्हें एकसूत्र में रखने कौशल विकसित करूँगी। कभी भी परिवार के विरुद्ध आचरण नहीं करूँगी।